25 जुलाई 2026: देवशयनी एकादशी से शुरू होगा चातुर्मास, जानें भगवान विष्णु का शयन काल
- by Praarthana Editorial Team
- Published: June 20, 2026
- Last updated: June 22, 2026
- 10 Mins

25 जुलाई 2026: देवशयनी एकादशी से शुरू होगा चातुर्मास, जानें भगवान विष्णु का शयन काल
हिंदू धर्म में तिथियों और पर्वों का विशेष महत्व होता है, और इनमें से कुछ तिथियां तो इतनी महत्वपूर्ण होती हैं कि वे पूरे वर्ष के लिए एक आध्यात्मिक दिशा तय कर देती हैं। ऐसी ही एक पावन तिथि है देवशयनी एकादशी। यह वह दिन है जब सृष्टि के पालक भगवान विष्णु चार महीने के लिए योगनिद्रा में चले जाते हैं, और इसी के साथ चातुर्मास का पवित्र काल आरंभ हो जाता है। वर्ष 2026 में, यह महत्वपूर्ण घटना 25 जुलाई 2026 को घटित होगी, जो भक्तों के लिए आत्मचिंतन, तपस्या और साधना का एक अद्वितीय अवसर लेकर आएगी। इस ब्लॉग पोस्ट में, हम देवशयनी एकादशी के महत्व, इसकी पूजा विधि, चातुर्मास के दौरान पालन किए जाने वाले नियम, और भगवान विष्णु के शयन काल से जुड़ी पौराणिक कथाओं का विस्तार से वर्णन करेंगे।
देवशयनी एकादशी का महत्व: एक आध्यात्मिक प्रवेश द्वार
आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवशयनी एकादशी कहा जाता है। इसे 'पद्मा एकादशी' या 'हरिशयनी एकादशी' के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन से भगवान विष्णु का शयन काल आरंभ होता है, जिसका अर्थ है कि वे चार माह के लिए क्षीरसागर में योगनिद्रा में लीन हो जाते हैं। इन चार महीनों की अवधि को ही चातुर्मास कहा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जब भगवान विष्णु योगनिद्रा में होते हैं, तब सृष्टि का संचालन भगवान शिव, माता पार्वती और अन्य देवी-देवता करते हैं।
देवशयनी एकादशी का व्रत रखने और इस दिन भगवान विष्णु की विशेष पूजा करने से अनंत पुण्य की प्राप्ति होती है। यह एकादशी भक्तों को आध्यात्मिक शुद्धि और आंतरिक शांति की ओर ले जाने का मार्ग प्रशस्त करती है। इस दिन किया गया दान, जप, तप और पुण्य कार्य कई गुना फलदायी माने जाते हैं। यह केवल भगवान के शयन का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह मनुष्य को अपनी इंद्रियों को संयमित करने, मन को शांत करने और स्वयं के भीतर झाँकने का संदेश भी देता है।
2026 में देवशयनी एकादशी की तिथि और विशेष महत्व
जैसा कि हमने बताया, वर्ष 2026 में देवशयनी एकादशी 25 जुलाई को मनाई जाएगी। यह तिथि अपने आप में महत्वपूर्ण है क्योंकि यह प्रकृति में बदलाव और आध्यात्मिक क्रियाकलापों के लिए एक नए चक्र की शुरुआत का प्रतीक है। इस दिन से विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन जैसे शुभ कार्य वर्जित हो जाते हैं, और भक्तजन अपना ध्यान व्रत, तपस्या और धार्मिक अनुष्ठानों पर केंद्रित करते हैं।
25 जुलाई 2026 का दिन भक्तों के लिए विशेष रूप से शुभ होगा। इस दिन सूर्योदय के साथ ही पवित्रता और समर्पण का वातावरण बन जाएगा। भक्त प्रातः काल उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर देवशयनी एकादशी के व्रत का संकल्प लेंगे और पूरे दिन भगवान विष्णु की आराधना में लीन रहेंगे। इस विशेष तिथि पर किया गया हर सत्कर्म उनके जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करेगा।
भगवान विष्णु का शयन काल: पौराणिक कथा
भगवान विष्णु के शयन काल की कथा अत्यंत रोचक और प्रेरणादायक है। यह कथा मुख्य रूप से वामन अवतार से जुड़ी हुई है। पौराणिक कथा के अनुसार, जब भगवान विष्णु ने वामन अवतार लेकर राजा बलि से तीन पग भूमि का दान माँगा था, तब राजा बलि ने उदारतापूर्वक यह दान देने का वचन दिया था। भगवान वामन ने अपने विशाल रूप में एक पग में पृथ्वी, दूसरे पग में स्वर्ग लोक को नाप लिया। जब तीसरे पग के लिए कोई स्थान नहीं बचा, तो राजा बलि ने अपना शीश भगवान के चरणों में अर्पित कर दिया।
राजा बलि की इस भक्ति और उदारता से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें वरदान माँगने को कहा। राजा बलि ने वरदान माँगा कि भगवान विष्णु उनके महल में ही निवास करें। भगवान विष्णु ने अपने भक्त की इच्छा का सम्मान करते हुए, आषाढ़ शुक्ल एकादशी से कार्तिक शुक्ल एकादशी तक राजा बलि के महल में निवास करने का वचन दिया। यह चार मास का समय ही भगवान विष्णु का शयन काल माना जाता है, जिसमें वे पाताल लोक में राजा बलि के द्वारपाल बनकर निवास करते हैं और योगनिद्रा में लीन रहते हैं। इस अवधि को भगवान विष्णु का शयन काल कहा जाता है।
यह कथा हमें बताती है कि किस प्रकार भगवान अपने भक्तों की भक्ति से वशीभूत होकर उनके दास भी बन जाते हैं। यह उनकी करुणा और प्रेम का अनुपम उदाहरण है।
देवशयनी एकादशी की पूजा विधि
देवशयनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। यह पूजा विधि विधान से करने पर मनोवांछित फल प्राप्त होते हैं।
पूजा की तैयारी:
- प्रातः काल स्नान: एकादशी के दिन सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नानादि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
- संकल्प: पूजा स्थल पर बैठकर हाथ में जल, फूल और अक्षत लेकर व्रत और पूजा का संकल्प लें।
- वेदी की स्थापना: एक साफ चौकी पर पीला वस्त्र बिछाएं। उस पर भगवान विष्णु या उनके किसी अवतार (जैसे कृष्ण) की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।
पूजा सामग्री:
- भगवान विष्णु की प्रतिमा या चित्र
- पीला वस्त्र
- जल, गंगाजल
- पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, चीनी का मिश्रण)
- तुलसी दल (विशेष रूप से महत्वपूर्ण)
- पीले फूल, फल, धूप, दीप
- मिठाई, नैवेद्य
- चंदन, रोली, अक्षत
पूजन विधि:
- सबसे पहले भगवान विष्णु को पंचामृत से स्नान कराएं। फिर शुद्ध जल से स्नान कराकर स्वच्छ वस्त्र पहनाएं।
- भगवान को चंदन, रोली का तिलक लगाएं और अक्षत अर्पित करें।
- पीले फूल, फल और तुलसी दल अर्पित करें। तुलसी दल भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय है।
- धूप-दीप प्रज्वलित करें।
- भगवान को नैवेद्य (मिठाई, फल) अर्पित करें। ध्यान रहे कि तुलसी दल के बिना भगवान भोग ग्रहण नहीं करते।
- विष्णु सहस्रनाम या अन्य विष्णु मंत्रों का जाप करें। "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" मंत्र का जाप विशेष फलदायी होता है।
- देवशयनी एकादशी की व्रत कथा का पाठ करें या सुनें।
- अंत में, भगवान विष्णु की आरती करें और सभी को प्रसाद वितरित करें।
अगले दिन द्वादशी तिथि को, सूर्योदय के बाद ब्राह्मणों को भोजन कराकर या दान देकर व्रत का पारण करें। पारण का समय मुहूर्त के अनुसार निर्धारित किया जाता है।
चातुर्मास: आध्यात्मिक और वैज्ञानिक पहलू
चातुर्मास केवल धार्मिक परंपरा नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहन आध्यात्मिक और वैज्ञानिक कारण भी छिपे हैं। यह चार मास की अवधि भारतीय संस्कृति और जीवन शैली का अभिन्न अंग रही है।
आध्यात्मिक पहलू:
- आत्म-चिंतन और साधना: यह अवधि आत्मावलोकन, आत्मसंयम और आध्यात्मिक उन्नति के लिए समर्पित होती है। चूंकि भगवान विष्णु योगनिद्रा में होते हैं, इसलिए माना जाता है कि इस दौरान आध्यात्मिक ऊर्जा अधिक तीव्रता से महसूस होती है।
- तप और त्याग: भक्तगण इस दौरान अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण रखते हुए तपस्या, व्रत और सात्विक जीवन का पालन करते हैं। यह उन्हें भौतिक मोह-माया से ऊपर उठकर ईश्वरीय चेतना से जुड़ने में मदद करता है।
- धार्मिक अनुष्ठान: चातुर्मास में जप, तप, दान, तीर्थ यात्रा (कुछ विशेष तीर्थों पर), और सत्संग का विशेष महत्व होता है। भगवान शिव, सूर्य देव और देवी दुर्गा की पूजा इस दौरान प्रमुखता से की जाती है।
- पापों का नाश: माना जाता है कि इस अवधि में किए गए पुण्य कर्मों से जन्म-जन्मांतर के पापों का नाश होता है और मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है।
वैज्ञानिक पहलू:
- स्वास्थ्य और आहार: चातुर्मास मुख्यतः वर्षा ऋतु (मानसून) के दौरान आता है। इस समय वातावरण में नमी बढ़ जाती है, जिससे पाचन शक्ति कमजोर होती है और कई तरह के संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है। इसलिए, इस दौरान हल्का, सुपाच्य और सात्विक भोजन खाने पर जोर दिया जाता है। प्याज, लहसुन, बैंगन, पत्तेदार सब्जियां और दही जैसे खाद्य पदार्थों से परहेज करने की सलाह दी जाती है, क्योंकि वे शरीर में वात, पित्त और कफ को बढ़ा सकते हैं।
- पर्यावरण और स्वच्छता: मानसून के दौरान कीचड़ और गंदगी से बीमारियाँ फैलने की संभावना अधिक होती है। चातुर्मास के नियम व्यक्तिगत स्वच्छता और पर्यावरण को साफ रखने पर जोर देते हैं, जिससे बीमारियों से बचाव होता है।
- सामाजिक संतुलन: इस अवधि में शुभ कार्यों पर रोक लगाने से लोग घर पर अधिक समय बिताते हैं, जिससे पारिवारिक संबंधों में मधुरता आती है। बाहरी यात्राओं से बचने की सलाह भी दी जाती है, जो उस समय के परिवहन साधनों और खराब सड़कों को देखते हुए एक व्यावहारिक सलाह थी।
- मानसिक शांति: नियमित अनुष्ठान, मंत्र जाप और ध्यान मानसिक शांति और एकाग्रता को बढ़ावा देते हैं, जो तनावपूर्ण जीवनशैली में बेहद आवश्यक है।
चातुर्मास के दौरान पालन किए जाने वाले नियम
चातुर्मास का समय आत्मसंयम और धर्मपरायणता का होता है। इस दौरान कुछ विशेष नियमों का पालन किया जाता है, जिन्हें दो श्रेणियों में बांटा जा सकता है: वर्जित कार्य और किए जाने वाले कार्य।
वर्जित कार्य (जो नहीं करने चाहिए):
- विवाह और मांगलिक कार्य: चातुर्मास में विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन, उपनयन संस्कार जैसे सभी शुभ और मांगलिक कार्य वर्जित होते हैं। माना जाता है कि भगवान विष्णु के शयन काल में शुभ ऊर्जा कम हो जाती है।
- विशेष खाद्य पदार्थों का सेवन:
- श्रावण मास में: पत्तेदार सब्जियां (जैसे पालक, मेथी), बैंगन, दूध और दही (कुछ परंपराओं में)।
- भाद्रपद मास में: दही।
- आश्विन मास में: दूध।
- कार्तिक मास में: दालें (खासकर उड़द दाल), तेल से बनी चीजें।
- सामान्य तौर पर, प्याज, लहसुन, मांस, मदिरा, तामसिक भोजन का सेवन पूरे चातुर्मास में वर्जित होता है।
- शयन पर नियम: बिस्तर पर सोने से बचें, जमीन पर चटाई या आसन पर सोना उत्तम माना जाता है।
- बाल कटवाना, दाढ़ी बनाना: कुछ परंपराओं में इस दौरान बाल कटवाने, दाढ़ी बनवाने या नाखून काटने से भी परहेज किया जाता है।
- लंबी यात्राएं: चातुर्मास में लंबी दूरी की यात्राओं से बचने की सलाह दी जाती है, विशेषकर धार्मिक यात्राओं को छोड़कर।
किए जाने वाले कार्य (जो करने चाहिए):
- व्रत और उपवास: एकादशी के व्रत सहित, अपनी श्रद्धा अनुसार अन्य व्रत उपवास रखने चाहिए।
- मंत्र जाप और ध्यान: भगवान के नाम का जाप (जैसे "हरे कृष्ण हरे राम" या "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय") और ध्यान करना अत्यंत फलदायी होता है।
- धर्म ग्रंथों का पाठ: श्रीमद्भागवत, रामचरितमानस, विष्णु पुराण, शिव पुराण जैसे धार्मिक ग्रंथों का नित्य पाठ करना चाहिए।
- दान-पुण्य: अपनी क्षमतानुसार जरूरतमंदों को दान करना चाहिए, चाहे वह अन्न दान हो, वस्त्र दान हो या ज्ञान दान।
- सात्विक जीवन: इस दौरान सादा, पवित्र और मर्यादित जीवन व्यतीत करना चाहिए। ब्रह्मचर्य का पालन करना भी शुभ माना जाता है।
- देवताओं की पूजा: भगवान विष्णु के शयन काल में भगवान शिव, माता दुर्गा, सूर्य देव और अन्य देवी-देवताओं की पूजा विशेष रूप से करनी चाहिए। श्रावण मास भगवान शिव को समर्पित होता है।
- नियमित स्नान और स्वच्छता: शारीरिक और मानसिक स्वच्छता बनाए रखना बहुत महत्वपूर्ण है।
- तीर्थ यात्रा: कुछ विशेष पवित्र स्थानों जैसे चार धाम (बद्रीनाथ, द्वारका, पुरी, रामेश्वरम) की यात्रा इस दौरान करने का विशेष महत्व है, यदि संभव हो।
चातुर्मास के प्रमुख व्रत और पर्व
चातुर्मास की अवधि में कई महत्वपूर्ण व्रत और त्योहार आते हैं, जो इस काल को और भी पवित्र बना देते हैं:
- श्रावण मास (सावन): यह पूरा मास भगवान शिव को समर्पित होता है। हर सोमवार को शिव मंदिरों में भक्तों की भीड़ उमड़ती है और कांवड़ यात्राएं निकाली जाती हैं।
- कृष्ण जन्माष्टमी: भगवान श्री कृष्ण का जन्मोत्सव भाद्रपद मास में बड़े धूमधाम से मनाया जाता है।
- गणेश चतुर्थी: भाद्रपद मास में ही भगवान गणेश का आगमन होता है, और 10 दिनों तक गणेशोत्सव मनाया जाता है।
- नवरात्रि: आश्विन मास में शारदीय नवरात्रि का पर्व आता है, जिसमें देवी दुर्गा के नौ रूपों की पूजा की जाती है।
- दशहरा (विजयदशमी): नवरात्रि के बाद दशहरा आता है, जो बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है।
- अन्य एकादशी व्रत: चातुर्मास में आने वाली सभी एकादशियों (कामिका एकादशी, पुत्रदा एकादशी, जया एकादशी, इंदिरा एकादशी, रमा एकादशी) का भी विशेष महत्व होता है।
देवउठनी एकादशी: चातुर्मास का समापन
चातुर्मास का समापन कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को होता है, जिसे देवउठनी एकादशी या प्रबोधिनी एकादशी कहते हैं। इस दिन भगवान विष्णु अपनी योगनिद्रा से जागृत होते हैं, और इसी के साथ सभी प्रकार के शुभ और मांगलिक कार्यों की पुनः शुरुआत हो जाती है। देवउठनी एकादशी के दिन तुलसी विवाह का भी आयोजन किया जाता है, जो भगवान विष्णु और माता तुलसी के मिलन का प्रतीक है। यह दिन पूरे चातुर्मास की तपस्या का फल मिलने का भी संकेत देता है।
निष्कर्ष
25 जुलाई 2026 को आने वाली देवशयनी एकादशी से शुरू होने वाला चातुर्मास का यह पवित्र काल, हर सनातनी के लिए आत्मशुद्धि, आध्यात्मिक विकास और भगवत् भक्ति का अनुपम अवसर है। भगवान विष्णु के शयन काल का यह समय हमें बाहरी आडंबरों से दूर रहकर आंतरिक शांति और पवित्रता की ओर ले जाता है। यह हमें संयम, तपस्या और सादगीपूर्ण जीवन का महत्व सिखाता है। धार्मिक नियमों का पालन करते हुए और सच्ची श्रद्धा से भगवान की आराधना करते हुए, हम इस चातुर्मास को अपने जीवन का सबसे फलदायी और आध्यात्मिक रूप से समृद्ध काल बना सकते हैं। आइए, इस पावन अवसर पर हम सब अपने मन, वचन और कर्म से भगवान विष्णु का स्मरण करें और उनके आशीर्वाद से अपने जीवन को धन्य बनाएं।
Frequently Asked Questions
Q: 2026 में देवशयनी एकादशी किस तारीख को है?
वर्ष 2026 में देवशयनी एकादशी 25 जुलाई को मनाई जाएगी।
Q: देवशयनी एकादशी को और किन नामों से जाना जाता है?
देवशयनी एकादशी को 'पद्मा एकादशी' या 'हरिशयनी एकादशी' के नाम से भी जाना जाता है।
Q: देवशयनी एकादशी किस हिन्दू मास में पड़ती है?
यह आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को पड़ती है।
Q: चातुर्मास क्या है और यह कब शुरू होता है?
चातुर्मास वह चार महीने की अवधि है जब भगवान विष्णु योगनिद्रा में चले जाते हैं। यह देवशयनी एकादशी से शुरू होता है।
Q: भगवान विष्णु शयन काल के दौरान कहाँ निवास करते हैं?
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान विष्णु क्षीरसागर में योगनिद्रा में लीन हो जाते हैं।
Q: जब भगवान विष्णु शयन काल में होते हैं, तब सृष्टि का संचालन कौन करता है?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जब भगवान विष्णु योगनिद्रा में होते हैं, तब सृष्टि का संचालन भगवान शिव, माता पार्वती और अन्य देवी-देवता करते हैं।
Q: देवशयनी एकादशी का व्रत रखने का क्या महत्व है?
देवशयनी एकादशी का व्रत रखने और इस दिन भगवान विष्णु की विशेष पूजा करने से अनंत पुण्य की प्राप्ति होती है। यह आध्यात्मिक शुद्धि और आंतरिक शांति का मार्ग प्रशस्त करती है।
Q: चातुर्मास के दौरान कौन से शुभ कार्य वर्जित होते हैं?
चातुर्मास के दौरान विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन जैसे शुभ कार्य वर्जित हो जाते हैं।
Q: चातुर्मास की अवधि में भक्तों को क्या करना चाहिए?
भक्तजन अपना ध्यान व्रत, तपस्या और धार्मिक अनुष्ठानों पर केंद्रित करते हैं। यह आत्मचिंतन, इंद्रियों को संयमित करने और स्वयं के भीतर झाँकने का संदेश भी देता है।
Q: 25 जुलाई 2026 को देवशयनी एकादशी के दिन क्या विशेष होगा?
यह तिथि प्रकृति में बदलाव और आध्यात्मिक क्रियाकलापों के लिए एक नए चक्र की शुरुआत का प्रतीक है। इस दिन किया गया हर सत्कर्म जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करेगा।
Q: देवशयनी एकादशी पर पूजा विधि क्या है?
भक्त प्रातः काल उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर देवशयनी एकादशी के व्रत का संकल्प लेते हैं और पूरे दिन भगवान विष्णु की आराधना में लीन रहते हैं।
Q: देवशयनी एकादशी पर किए गए दान-पुण्य का क्या फल मिलता है?
इस दिन किया गया दान, जप, तप और पुण्य कार्य कई गुना फलदायी माने जाते हैं।
Q: भगवान विष्णु के शयन काल की पौराणिक कथा किससे जुड़ी है?
भगवान विष्णु के शयन काल की कथा मुख्य रूप से वामन अवतार से जुड़ी हुई है।
Q: वामन अवतार की कथा में भगवान विष्णु ने राजा बलि से क्या माँगा था?
पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान विष्णु ने वामन अवतार लेकर राजा बलि से तीन पग भूमि का दान माँगा था।
Q: देवशयनी एकादशी आध्यात्मिक रूप से क्या संदेश देती है?
यह मनुष्य को अपनी इंद्रियों को संयमित करने, मन को शांत करने और स्वयं के भीतर झाँकने का संदेश देती है।
Praarthana Editorial Team
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