नवरात्रि चौथा दिन: मां कूष्मांडा की आराधना
- by Praarthana Editorial Team
- Published: June 22, 2026
- Last updated: June 22, 2026
- 10 Mins

शक्ति और भक्ति का महापर्व, नवरात्रि, हमें मां दुर्गा के विभिन्न दिव्य स्वरूपों की आराधना करने का अनुपम अवसर प्रदान करता है। नौ दिनों तक चलने वाला यह उत्सव, आध्यात्मिक ऊर्जा और पवित्रता से ओतप्रोत होता है, जहां हर दिन मां के एक विशेष रूप की पूजा कर भक्तजन उनसे शक्ति, ज्ञान और आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। आज हम बात करेंगे नवरात्रि के चौथे दिन की, जो कि मां दुर्गा के चौथे स्वरूप, मां कूष्मांडा को समर्पित है। यह दिन अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि मां कूष्मांडा को ब्रह्मांड की जननी और सभी ऊर्जाओं का स्रोत माना जाता है। उनकी आराधना से न केवल आरोग्य और तेज की प्राप्ति होती है, बल्कि जीवन में सकारात्मकता और नई ऊर्जा का संचार भी होता है।
अगर आप भी जीवन में बीमारियों, आलस्य और निराशा से जूझ रहे हैं, तो मां कूष्मांडा की भक्ति आपको नवजीवन प्रदान कर सकती है। आइए, इस पावन दिन पर मां कूष्मांडा के दिव्य स्वरूप, उनके महत्व, पूजा विधि, और उनसे जुड़े पौराणिक प्रसंगों को विस्तार से जानें।
मां कूष्मांडा कौन हैं?
ब्रह्मांड की रचना से पूर्व जब चारों ओर गहन अंधकार और शून्य व्याप्त था, तब केवल मां भगवती का ही अस्तित्व था। यह मां कूष्मांडा ही थीं जिन्होंने अपनी मंद मुस्कान से इस शून्य को ब्रह्मांड में परिवर्तित किया। 'कूष्मांडा' नाम का अर्थ ही इस दिव्य कार्य से जुड़ा है: 'कू' का अर्थ है 'छोटा', 'ऊष्मा' का अर्थ है 'गर्मी' या 'ऊर्जा', और 'अंडा' का अर्थ है 'ब्रह्मांडीय अंडा'। इस प्रकार, मां कूष्मांडा वह देवी हैं जिन्होंने अपनी छोटी सी मुस्कान से ब्रह्मांड को ऊष्मा और ऊर्जा प्रदान की।
पुराणों के अनुसार, जब सृष्टि का कोई अस्तित्व नहीं था, तब मां कूष्मांडा ने अपने हल्के हास्य से सृष्टि की रचना की। वे सूर्यलोक में निवास करती हैं और वहीं से ब्रह्मांड को ऊर्जा प्रदान करती हैं। उनमें सूर्य के समान तेज और शक्ति है, और वे ही समस्त ब्रह्मांड की ऊर्जा का मूल स्रोत हैं। इन्हीं कारणों से उन्हें सृष्टि की आदि शक्ति और ब्रह्मांड की जननी के रूप में पूजा जाता है। उनकी शक्ति और तेज से ही सभी ग्रह-नक्षत्र प्रकाशित होते हैं और जीवन को गति मिलती है।
मां कूष्मांडा का दिव्य स्वरूप
मां कूष्मांडा का स्वरूप अत्यंत तेजस्वी और भव्य है, जो उनके ब्रह्मांडीय शक्ति को दर्शाता है। उनका वर्ण सोने के समान चमकीला और देदीप्यमान है, जो सूर्य के तेज और जीवनदायिनी ऊर्जा का प्रतीक है। मां की आठ भुजाएं हैं, इसलिए इन्हें अष्टभुजा देवी के नाम से भी जाना जाता है। इन आठों भुजाओं में वे विभिन्न प्रकार के अस्त्र-शस्त्र और शुभ वस्तुएं धारण करती हैं, जो उनके विविध कार्यों और शक्तियों का प्रतिनिधित्व करते हैं:
- कमंडल: जल और जीवन का प्रतीक।
- धनुष और बाण: बुराई पर विजय और भक्तों की रक्षा का प्रतीक।
- कमल का फूल: पवित्रता, ज्ञान और आध्यात्मिक उन्नति का प्रतीक।
- अमृत कलश: अमरता, आरोग्य और दिव्य ज्ञान का प्रतीक।
- चक्र: समय के चक्र और ब्रह्मांडीय व्यवस्था का प्रतीक।
- गदा: शक्ति, न्याय और शत्रुओं के विनाश का प्रतीक।
इन सात वस्तुओं के अतिरिक्त, आठवीं भुजा में मां एक जपमाला धारण करती हैं, जो भक्तों को तपस्या और आध्यात्मिक साधना का संदेश देती है। मां का वाहन सिंह है, जो शक्ति, साहस और धर्म की रक्षा का प्रतीक है। उनके मुख पर एक मंद-मंद मुस्कान सदैव विराजमान रहती है, जो उनकी सौम्यता और समस्त सृष्टि के प्रति उनके प्रेम और करुणा को दर्शाती है। यह मुस्कान ही वह दिव्य शक्ति है जिससे उन्होंने ब्रह्मांड का सृजन किया।
नवरात्रि के चौथे दिन का महत्व
नवरात्रि के चौथे दिन मां कूष्मांडा की पूजा का विशेष महत्व है। यह दिन भक्तों को न केवल शारीरिक और मानसिक रूप से मजबूत बनाता है, बल्कि उन्हें आध्यात्मिक उन्नति की ओर भी अग्रसर करता है। इस दिन की पूजा से व्यक्ति अपने भीतर की नकारात्मक शक्तियों पर विजय प्राप्त कर सकता है और सकारात्मक ऊर्जा से भर जाता है।
मान्यता है कि मां कूष्मांडा की उपासना से व्यक्ति के जीवन से सभी प्रकार के कष्ट, रोग और शोक दूर हो जाते हैं। जो भक्त सच्चे मन और पूर्ण श्रद्धा के साथ इस दिन मां की आराधना करते हैं, उन्हें लंबी आयु, यश, बल और आरोग्य का वरदान प्राप्त होता है। यह दिन विशेष रूप से उन लोगों के लिए फलदायी है जो जीवन में किसी प्रकार के भय, आलस्य या निराशा से ग्रस्त हैं। मां कूष्मांडा की पूजा से आत्मविश्वास बढ़ता है और चुनौतियों का सामना करने की शक्ति मिलती है।
आरोग्य और तेज की देवी मां कूष्मांडा
मां कूष्मांडा को आरोग्य और तेज की देवी के रूप में विशेष रूप से पूजा जाता है। यह उनके सूर्यलोक में निवास करने और समस्त ब्रह्मांड को ऊर्जा प्रदान करने की क्षमता से जुड़ा है। उनकी पूजा से भक्तों को कई प्रकार के शारीरिक और मानसिक लाभ प्राप्त होते हैं:
- शारीरिक आरोग्य: मां कूष्मांडा की आराधना से सभी प्रकार के रोगों और व्याधियों से मुक्ति मिलती है। वे शरीर में ऊर्जा का संचार करती हैं और रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाती हैं। जो लोग अक्सर बीमार रहते हैं, उन्हें इस दिन मां की पूजा अवश्य करनी चाहिए। वे जीवनदायिनी शक्ति का स्रोत हैं, जो शरीर को स्वस्थ और शक्तिशाली बनाती हैं।
- मानसिक शांति और तेज: मां कूष्मांडा की उपासना से मन को शांति मिलती है और मानसिक तनाव दूर होता है। उनकी कृपा से व्यक्ति के भीतर सकारात्मक ऊर्जा और तेज का संचार होता है। यह तेज केवल बाहरी चमक नहीं, बल्कि आंतरिक आभा है जो व्यक्ति के व्यक्तित्व को निखारती है और उसे ओजस्वी बनाती है। यह आत्मविश्वास, उत्साह और निर्णय लेने की क्षमता को बढ़ाता है।
- लंबी आयु और यश: ऐसी मान्यता है कि मां कूष्मांडा की भक्ति से भक्तों को लंबी आयु का वरदान प्राप्त होता है। वे जीवन के हर क्षेत्र में सफलता और यश प्राप्त करते हैं। उनके जीवन में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं और उन्हें हर कार्य में सिद्धि मिलती है।
- आलस्य का नाश: मां कूष्मांडा सूर्य के समान ऊर्जावान हैं, और उनकी पूजा से भक्तों का आलस्य दूर होता है। वे कर्मठ और सक्रिय बनते हैं, जिससे उनके जीवन में प्रगति आती है।
- सकारात्मकता का संचार: देवी की उपासना से नकारात्मक विचार और भावनाएं दूर होती हैं। मन में उत्साह, आशा और सकारात्मकता का संचार होता है, जिससे जीवन में खुशियां आती हैं।
मां कूष्मांडा और अनाहत चक्र: योगिक परंपरा के अनुसार, मां कूष्मांडा का संबंध अनाहत चक्र से है, जिसे हृदय चक्र भी कहते हैं। यह चक्र प्रेम, करुणा, सहानुभूति और भावनात्मक संतुलन से जुड़ा है। मां कूष्मांडा की आराधना करने से अनाहत चक्र सक्रिय और संतुलित होता है, जिससे व्यक्ति के भीतर प्रेम, दया और सहिष्णुता की भावनाएं प्रबल होती हैं। यह भावनात्मक उपचार में सहायक है और व्यक्ति को मानसिक रूप से मजबूत बनाता है। अनाहत चक्र के संतुलित होने से व्यक्ति शारीरिक और भावनात्मक रूप से स्वस्थ महसूस करता है, और उसे आत्म-प्रेम तथा दूसरों के प्रति सम्मान की भावना का अनुभव होता है।
मां कूष्मांडा पूजा विधि
नवरात्रि के चौथे दिन मां कूष्मांडा की पूजा अत्यंत विधि-विधान से करनी चाहिए। यह पूजा भक्तों को विशेष फल प्रदान करती है।
पूजा की तैयारी:
- स्नान और शुद्धि: सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
- संकल्प: पूजा शुरू करने से पहले हाथ में जल, फूल और अक्षत लेकर मां के समक्ष अपनी मनोकामना बोलते हुए पूजा का संकल्प लें।
- वेदी स्थापना: एक साफ स्थान पर मां दुर्गा की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें। गंगाजल छिड़ककर स्थान को पवित्र करें।
- कलश स्थापना: अगर पहले दिन कलश स्थापित किया है, तो उसी की पूजा करें।
- सामग्री: पूजा के लिए आवश्यक सामग्री एकत्र कर लें। इसमें मां कूष्मांडा को प्रिय पेठा (कद्दू की मिठाई) अवश्य शामिल करें।
पूजा सामग्री:
- मां कूष्मांडा की मूर्ति या तस्वीर
- लाल रंग के वस्त्र (मां को अर्पित करने हेतु)
- लाल फूल (गुड़हल या गुलाब)
- कुंकुम, हल्दी, सिंदूर, अक्षत (चावल)
- धूप, दीप, अगरबत्ती
- फल (केला, सेब)
- मिठाई (विशेष रूप से पेठा या मालपुआ)
- पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, गंगाजल का मिश्रण)
- पान-सुपारी, लौंग, इलायची
- शुद्ध जल, गंगाजल
- दीपक जलाने के लिए घी या तेल
- कपूर, आरती के लिए।
पूजा के चरण:
- आवाहन: सबसे पहले मां कूष्मांडा का ध्यान करें और उन्हें अपनी पूजा में आने का आह्वान करें।
- आसन: मां को आसन ग्रहण करने के लिए प्रार्थना करें।
- स्नान: मां की मूर्ति को पंचामृत से स्नान कराएं, फिर शुद्ध जल से स्नान कराएं।
- वस्त्र और आभूषण: मां को लाल वस्त्र और आभूषण अर्पित करें।
- तिलक: कुमकुम, हल्दी और सिंदूर से मां को तिलक लगाएं।
- पुष्प और माला: मां को लाल फूल और फूलों की माला अर्पित करें।
- धूप और दीप: धूप और दीपक प्रज्वलित करें।
- नैवेद्य: मां को पेठा, मालपुआ या अन्य फल और मिठाई का भोग लगाएं। जल भी अर्पित करें।
- पान-सुपारी: पान, सुपारी, लौंग और इलायची अर्पित करें।
- मंत्र जाप: कम से कम 108 बार मां कूष्मांडा के मंत्रों का जाप करें। (मंत्र नीचे दिए गए हैं)।
- दुर्गा सप्तशती पाठ: संभव हो तो दुर्गा सप्तशती के चौथे अध्याय का पाठ करें।
- आरती: अंत में कपूर या घी के दीपक से मां कूष्मांडा की आरती करें।
- प्रदक्षिणा: आरती के बाद मां की परिक्रमा करें।
- क्षमा याचना: पूजा में हुई किसी भी त्रुटि के लिए मां से क्षमा याचना करें।
- प्रसाद वितरण: पूजा के बाद प्रसाद सभी में वितरित करें।
मां कूष्मांडा के मंत्र
मां कूष्मांडा की आराधना में मंत्र जाप का विशेष महत्व है। मंत्रों के उच्चारण से दिव्य ऊर्जा का संचार होता है और मन एकाग्र होता है।
मुख्य मंत्र:
या देवी सर्वभूतेषु मां कूष्मांडा रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
(अर्थ: हे देवी! जो सभी प्राणियों में मां कूष्मांडा के रूप में स्थित हैं, उनको बार-बार नमस्कार है।)
अन्य शक्तिशाली मंत्र:
- ॐ ऐं ह्रीं क्लीं कूष्मांडा नमः॥
- ॐ कूष्मांडा देव्यै नमः॥
- वन्दे वांछित कामर्थे चन्द्रार्धकृत शेखराम्।
सिंहरूढ़ा अष्टभुजा कूष्मांडा यशस्विनीम्॥
(अर्थ: मैं उन देवी कूष्मांडा को वंदन करता हूँ जो अर्धचन्द्र धारण करती हैं, सिंह पर आरूढ़ हैं, आठ भुजाओं वाली हैं और यशस्विनी हैं।)
इन मंत्रों का जाप रुद्राक्ष या कमलगट्टे की माला से करना अत्यंत शुभ माना जाता है। मंत्र जाप से मन को शांति मिलती है और मां की कृपा शीघ्र प्राप्त होती है।
पौराणिक प्रसंग: ब्रह्मांड की जननी
मां कूष्मांडा की उत्पत्ति और उनके द्वारा ब्रह्मांड की रचना का प्रसंग अत्यंत अद्भुत और रहस्यमय है। यह दर्शाता है कि कैसे शून्य से सृष्टि का निर्माण हुआ।
पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब सृष्टि का कोई अस्तित्व नहीं था, चारों ओर केवल गहन अंधकार, शून्य और सन्नाटा व्याप्त था। न कोई लोक था, न कोई ग्रह, न तारे, न ही कोई जीवन। सब कुछ अंधकार में लीन था। तब उस अनादि, अनन्त अंधकार में अचानक एक दिव्य प्रकाश पुंज प्रकट हुआ। यह प्रकाश पुंज कोई और नहीं, बल्कि आदिशक्ति मां दुर्गा का ही स्वरूप, मां कूष्मांडा थीं।
उन्होंने अपनी मंद-मंद मुस्कान से इस अंधकारमय शून्य को आलोकित किया। उनकी उस छोटी सी, दिव्य मुस्कान से ही ब्रह्मांड की उत्पत्ति हुई। यह उनका हास्य ही था जिसने समस्त ब्रह्मांड को ऊर्जा प्रदान की और उसमें जीवन का संचार किया। उन्होंने ब्रह्मांडीय अंडे (ब्रह्मांड) को अपने तेज से गर्भित किया और उससे समस्त सृष्टि का सृजन हुआ।
मां कूष्मांडा ने अपने स्वरूप से सूर्य, चंद्रमा और अन्य ग्रहों को जन्म दिया। उन्होंने ही सूर्य को उसका तेज प्रदान किया और उसे ब्रह्मांड के केंद्र में स्थापित किया, ताकि वह समस्त लोकों को प्रकाश और ऊर्जा दे सके। यह माना जाता है कि मां कूष्मांडा सूर्यलोक में निवास करती हैं और वहीं से वे ब्रह्मांड की समस्त ऊर्जा को नियंत्रित करती हैं। उनकी शक्ति से ही सूर्य में इतना तेज है कि वह लगातार प्रकाश और गर्मी उत्सर्जित करता रहता है।
इसी कारण, मां कूष्मांडा को सृष्टि की आदि शक्ति, ब्रह्मांड की जननी और समस्त ऊर्जा का स्रोत माना जाता है। वे ही जीवन को गति देती हैं और संपूर्ण जगत का पालन-पोषण करती हैं। उनकी यह अद्भुत लीला हमें सिखाती है कि कैसे नकारात्मकता और शून्य से भी सकारात्मकता और जीवन का सृजन हो सकता है। उनकी पूजा हमें अपने भीतर की सुप्त शक्तियों को जागृत करने और जीवन में नए सृजन के लिए प्रेरित करती है।
निष्कर्ष
नवरात्रि का चौथा दिन, मां कूष्मांडा की आराधना का दिन, हमें यह याद दिलाता है कि ब्रह्मांड की सबसे बड़ी शक्ति एक कोमल मुस्कान और असीम ऊर्जा में समाहित है। मां कूष्मांडा की पूजा हमें न केवल शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य प्रदान करती है, बल्कि हमारे भीतर आत्मविश्वास, साहस और सकारात्मकता का संचार भी करती है। उनकी आराधना से जीवन के सभी अंधकार दूर होते हैं और प्रकाश व खुशियों का आगमन होता है।
इस पावन अवसर पर, सच्चे मन से मां कूष्मांडा का ध्यान करें, उनके मंत्रों का जाप करें और पूरी श्रद्धा के साथ उनकी पूजा करें। ऐसा करने से आप निश्चित रूप से आरोग्य, तेज, बल और समस्त मनोकामनाओं की पूर्ति का आशीर्वाद प्राप्त करेंगे। मां कूष्मांडा की कृपा से आपका जीवन सदैव सुखमय और आनंदमय बना रहे।
जय मां कूष्मांडा!
Frequently Asked Questions
Q: नवरात्रि का चौथा दिन किस देवी को समर्पित है?
नवरात्रि का चौथा दिन मां दुर्गा के चौथे स्वरूप, मां कूष्मांडा को समर्पित है।
Q: मां कूष्मांडा को किस रूप में पूजा जाता है?
मां कूष्मांडा को ब्रह्मांड की जननी और सभी ऊर्जाओं का स्रोत माना जाता है। उन्हें सृष्टि की आदि शक्ति और ब्रह्मांड की जननी के रूप में पूजा जाता है।
Q: मां कूष्मांडा की आराधना से क्या लाभ मिलते हैं?
मां कूष्मांडा की आराधना से आरोग्य और तेज की प्राप्ति होती है, जीवन में सकारात्मकता और नई ऊर्जा का संचार होता है, और बीमारियों, आलस्य तथा निराशा से मुक्ति मिलती है।
Q: 'कूष्मांडा' नाम का क्या अर्थ है?
'कूष्मांडा' नाम का अर्थ है 'कू' (छोटा), 'ऊष्मा' (गर्मी या ऊर्जा), और 'अंडा' (ब्रह्मांडीय अंडा)। इस प्रकार, मां कूष्मांडा वह देवी हैं जिन्होंने अपनी छोटी सी मुस्कान से ब्रह्मांड को ऊष्मा और ऊर्जा प्रदान की।
Q: मां कूष्मांडा ने ब्रह्मांड की रचना कैसे की?
ब्रह्मांड की रचना से पूर्व जब गहन अंधकार और शून्य व्याप्त था, तब मां कूष्मांडा ने अपनी मंद मुस्कान या हल्के हास्य से इस शून्य को ब्रह्मांड में परिवर्तित किया और सृष्टि की रचना की।
Q: मां कूष्मांडा कहां निवास करती हैं?
मां कूष्मांडा सूर्यलोक में निवास करती हैं और वहीं से ब्रह्मांड को ऊर्जा प्रदान करती हैं।
Q: मां कूष्मांडा का दिव्य स्वरूप कैसा है?
मां कूष्मांडा का स्वरूप अत्यंत तेजस्वी और भव्य है। उनका वर्ण सोने के समान चमकीला है, उनकी आठ भुजाएं हैं (इसलिए इन्हें अष्टभुजा देवी भी कहते हैं), और उनका वाहन सिंह है। उनके मुख पर सदैव एक मंद-मंद मुस्कान विराजमान रहती है।
Q: मां कूष्मांडा अपनी आठ भुजाओं में क्या-क्या धारण करती हैं?
मां कूष्मांडा अपनी आठ भुजाओं में कमंडल, धनुष, बाण, कमल का फूल, अमृत कलश, चक्र, गदा और एक जपमाला धारण करती हैं।
Q: मां कूष्मांडा के वाहन सिंह का क्या महत्व है?
मां कूष्मांडा का वाहन सिंह शक्ति, साहस और धर्म की रक्षा का प्रतीक है।
Q: मां कूष्मांडा के स्वरूप में कमल का फूल क्या दर्शाता है?
मां कूष्मांडा के स्वरूप में कमल का फूल पवित्रता, ज्ञान और आध्यात्मिक उन्नति का प्रतीक है।
Praarthana Editorial Team
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