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हाथी की सवारी का स्वप्न

हाथी की सवारी का स्वप्न

कौण्डिन्यपुर के निकट एक महा वन था जिसमें भगवान गणाध्यक्ष का एक प्राचीन मंदिर था। दक्ष ने उस मंदिर में जाकर गणेश्वर के एक अक्षरीय मन्त्र "गम" का जप आरंभ किया। दक्ष जब मन्त्र जाप कर रहा था उसी वक्त उसने खुद को हाथी पर सवार देखा। दक्ष ने यह स्वप्न अपने माता को सुनाया जिसपर उनकी मां ने कहा "हे पुत्र तुमने जो स्वप्न देखा है वो तो उत्तम है, स्वप्न में हाथी का दर्शन यानी श्री गणेश का दर्शन। हाथी की सवारी करने का अर्थ राज्य पद की प्राप्ति होना है।" 

कौण्डिन्यपुर में उस समय चन्द्रषेन का शासन था, चन्द्रषेन की मृत्य अकस्मात हो गयी। अपने राजा के मृत्यु से पुरे नगर में शोक छा गया। राजा की पत्नी अपने पति की मृत्यु सहन नहीं कर पायी और बेहोश हो गयी उसी वक्त उनके सामने एक ब्रह्म ने उन्हें सांत्वना देते हुए कहा, "पुत्री जिसका जितना समय होता है वह इस मृत्युलोक में उतने ही दिन रहता है। यही नियति है और नियति से परे कोई नहीं है।

अब जो चला गया उसका अंतिम संस्कार कर देना ही उसके प्रति अपनी श्रद्धा दिखाने का अंतिम अवसर है।" राजा चन्द्रषेन का कोई पुत्र या परिवारजन नहीं थे इसलिए राज्य के प्रधानमंत्री ने उनका अंतिम संस्कार किया। राजा के सभी क्रिया के बाद मंत्रियो ने नए राजा चुनने के लिए सभी मंत्रियों की सभा बुलाई। मंत्रियों के लिए यह चुनाव चुनौतीपूर्ण था तभी वहां महाऋषि मुदकल आ गए। मंत्रियों ने अपनी व्यथा ऋषि को सुनाई जिसपर ऋषि ने कहा "हाथी अपने सूंढ़ से जिसके गले में माला दाल दे उसे ही इस राज्य का नया राजा घोषित करना उचित रहेगा"

इस कार्य को सम्पन्न करने के लिए मंत्रियो ने ऋषि के कहने पर एक उत्सव का आयोजन किया जिसमे चहुंओर से लोगो ने भाग लिया। दक्ष भी दर्शक के रूप में आयोजन में शामिल हुआ। रानी ने पुष्पक नामक एक हाथी के सूंढ़ में एक रत्न माला डाली और प्रार्थना कि "हे गजराज यह माला किसी ऐसे योग्य व्यक्ति के गले में डालना जो धर्मपूर्वक यह राज्य चला सके।"

हाथी प्रार्थना सुन इधर उधर जान समूह के बिच चलने लगा कुछ वक्त किसी के पास रुकता,उसे सूंघता, फिर आगे निकल जाता अंत में वह दक्ष के पास पहुँच गया और उसे देखते ही उसके गले में रत्नमाला पहना दी और उसे अपने सूंढ़ से उठा अपने ऊपर बिठा दिया।

कौण्डिन्यपुर प्रदेश को अपना राजा मिल गया था। सर्वज्ञ उसके नाम का जय जयकार गूंजने लगा। राजा दक्ष का महल में भव्य स्वागत हुआ, उनका राज्याभिषेक हुआ और उनके मस्तक की शोभा मुकुट ने बढ़ा दी। राजा दक्ष ने अपना सुख पूर्वक उस राज्य को भोगा। 

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

Q: दक्ष ने गणेश्वर के किस मन्त्र का जप किया?

दक्ष ने कौण्डिन्यपुर के निकट स्थित भगवान गणाध्यक्ष के मंदिर में गणेश्वर के एक अक्षरीय मन्त्र "गम" का जप किया।

Q: मन्त्र जाप करते समय दक्ष ने क्या स्वप्न देखा?

मन्त्र जाप करते समय दक्ष ने खुद को हाथी पर सवार देखा।

Q: दक्ष की माता ने हाथी की सवारी के स्वप्न का क्या अर्थ बताया?

दक्ष की माता ने बताया कि स्वप्न में हाथी का दर्शन यानी श्री गणेश का दर्शन और हाथी की सवारी करने का अर्थ राज्य पद की प्राप्ति होना है।

Q: कौण्डिन्यपुर का राजा कौन था और उसकी मृत्यु कैसे हुई?

कौण्डिन्यपुर में चन्द्रषेन का शासन था, और उनकी मृत्यु अकस्मात हो गयी।

Q: राजा चन्द्रषेन की मृत्यु के बाद नए राजा के चुनाव के लिए महाऋषि मुदकल ने क्या सुझाव दिया?

महाऋषि मुदकल ने सुझाव दिया कि हाथी अपने सूँढ़ से जिसके गले में माला डाल दे उसे ही राज्य का नया राजा घोषित किया जाए।

Q: नए राजा के चुनाव के लिए आयोजित उत्सव में रानी ने किस हाथी को रत्न माला अर्पित की?

रानी ने पुष्पक नामक एक हाथी के सूँढ़ में एक रत्न माला डाली।

Q: रानी ने गजराज पुष्पक से क्या प्रार्थना की?

रानी ने प्रार्थना की, "हे गजराज यह माला किसी ऐसे योग्य व्यक्ति के गले में डालना जो धर्मपूर्वक यह राज्य चला सके।"

Q: हाथी पुष्पक ने किसे कौण्डिन्यपुर का नया राजा चुना?

हाथी पुष्पक ने दर्शक के रूप में शामिल हुए दक्ष को कौण्डिन्यपुर का नया राजा चुना।

Q: दक्ष को राजा चुनने के बाद हाथी ने क्या किया?

हाथी ने दक्ष के गले में रत्नमाला पहनाई और उसे अपने सूँढ़ से उठा अपने ऊपर बिठा दिया।

Q: कौण्डिन्यपुर के नए राजा का नाम क्या था?

कौण्डिन्यपुर के नए राजा का नाम दक्ष था।

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प्रार्थना संपादकीय टीम

प्रार्थना संपादकीय टीम आपकी आध्यात्मिक यात्रा का समर्थन करने के लिए दैनिक आध्यात्मिक मार्गदर्शन, प्रामाणिक अनुष्ठान और प्राचीन सनातन शास्त्रों से गहरे अंतर्दृष्टि साझा करती है।

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