राधा अष्टमी 2026 कब है? जानें शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और महत्व
- द्वारा प्रार्थना संपादकीय टीम
- प्रकाशित: September 15, 2026
- अंतिम अपडेट: September 15, 2026
- 5 Mins

सनातन धर्म में राधा अष्टमी का पर्व भगवान कृष्ण की प्रियसी और उनकी शक्ति स्वरूपा देवी राधा रानी के जन्मोत्सव के रूप में अत्यंत श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है। यह पर्व न केवल प्रेम और भक्ति का प्रतीक है, बल्कि यह भक्तों को राधा-कृष्ण के अलौकिक संबंध और उनके आध्यात्मिक महत्व से भी अवगत कराता है। इस विशेष दिन पर राधा रानी की पूजा-अर्चना करने से भगवान कृष्ण भी प्रसन्न होते हैं और भक्तों को असीम सुख, समृद्धि और मोक्ष की प्राप्ति होती है। 2026 में राधा अष्टमी कब मनाई जाएगी, इसका शुभ मुहूर्त क्या है, पूजा विधि क्या है और इस उत्सव का आध्यात्मिक महत्व क्या है, आइए जानते हैं विस्तार से।
राधा अष्टमी 2026: एक अवलोकन
राधा अष्टमी का पर्व हर साल भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है। यह भगवान कृष्ण के जन्मोत्सव, जन्माष्टमी, के ठीक 15 दिन बाद आता है। इस दिन भक्त उपवास रखते हैं, राधा रानी की विशेष पूजा करते हैं और उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान करते हैं।
राधा अष्टमी 2026 की तिथि
वर्ष 2026 में, राधा अष्टमी का पावन पर्व सोमवार, 31 अगस्त 2026 को मनाया जाएगा। यह तिथि वैष्णव और गैर-वैष्णव दोनों ही समुदायों में अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है।
जन्माष्टमी से संबंध
जैसा कि पहले बताया गया है, राधा अष्टमी भगवान कृष्ण के जन्मोत्सव (जन्माष्टमी) के ठीक 15 दिन बाद आती है। कृष्ण जन्माष्टमी भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मनाई जाती है, जबकि राधा अष्टमी भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी को। यह तिथि चक्र राधा-कृष्ण के शाश्वत संबंध और उनके लीलाओं का प्रतीक है, जहाँ दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। कहा जाता है कि राधा के बिना कृष्ण अधूरे हैं और कृष्ण के बिना राधा।
राधा अष्टमी 2026 शुभ मुहूर्त
राधा अष्टमी की पूजा का विधान मुख्य रूप से मध्यान काल (दोपहर) में किया जाता है, क्योंकि पौराणिक मान्यताओं के अनुसार राधा रानी का जन्म इसी समय हुआ था। आइए 2026 के लिए शुभ मुहूर्त पर एक नज़र डालें:
- अष्टमी तिथि प्रारंभ: 30 अगस्त 2026, रविवार को रात्रि लगभग 09:20 बजे से (यह समय स्थानीय पंचांग के अनुसार थोड़ा भिन्न हो सकता है)
- अष्टमी तिथि समाप्त: 31 अगस्त 2026, सोमवार को रात्रि लगभग 10:35 बजे तक (यह समय स्थानीय पंचांग के अनुसार थोड़ा भिन्न हो सकता है)
- पूजा का मध्यान मुहूर्त: 31 अगस्त 2026, सोमवार को दोपहर 12:00 बजे से 01:00 बजे तक (लगभग, स्थानीय सूर्योदय के अनुसार थोड़ा परिवर्तन संभव है)
भक्तों को सलाह दी जाती है कि वे अपने स्थानीय पंचांग और पुरोहितों से संपर्क करके सटीक मुहूर्त की जानकारी प्राप्त करें, ताकि पूजा विधि को पूर्ण श्रद्धा और सही समय पर संपन्न किया जा सके।
कौन हैं राधा रानी?
राधा रानी, जिन्हें राधिका, राधारानी और किशोरी जी के नाम से भी जाना जाता है, भगवान श्रीकृष्ण की अनंत शक्ति और उनकी प्रमुख प्रियसी हैं। वे प्रेम, सौंदर्य, भक्ति और करुणा की साक्षात मूर्ति हैं। वैष्णव परंपरा, विशेषकर गौड़ीय वैष्णव धर्म में, राधा रानी को सर्वोच्च देवी के रूप में पूजा जाता है, जो भगवान कृष्ण की सर्वोच्च भक्ति और शक्ति का प्रतिनिधित्व करती हैं।
राधा रानी का जन्म
पौराणिक कथाओं के अनुसार, राधा रानी का जन्म भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को वृषभानु और कीर्तिदा (कीर्ति) नामक एक धनी गोप दंपति के घर बरसाना नामक गाँव में हुआ था। यह गाँव मथुरा से कुछ ही दूरी पर स्थित है और आज भी राधा रानी के जन्मस्थान के रूप में जाना जाता है, जहाँ एक भव्य राधा रानी मंदिर भी है।
एक प्रचलित कथा के अनुसार, राधा रानी का जन्म अत्यंत चमत्कारी ढंग से हुआ था। ऐसा माना जाता है कि जब राधा रानी का जन्म हुआ, तब उनकी आँखें बंद थीं और उन्होंने तब तक अपनी आँखें नहीं खोलीं, जब तक कि उन्होंने पहली बार भगवान कृष्ण को नहीं देखा। कुछ कथाओं के अनुसार, वृषभानु जी को यमुना नदी में एक कमल के फूल पर एक कन्या मिली थी, जिसे वे घर ले आए और उसी कन्या को राधा नाम दिया गया। यह दिव्य घटना दर्शाती है कि राधा रानी का अवतार विशेष रूप से भगवान कृष्ण के साथ उनकी लीलाओं और प्रेम को प्रकट करने के लिए हुआ था। वे भगवान कृष्ण की ह्लादिनी शक्ति हैं, जिसका अर्थ है उनकी आनंद देने वाली शक्ति।
प्रेम और भक्ति की प्रतीक
राधा रानी को निस्वार्थ प्रेम (प्रेम), शुद्ध भक्ति (भक्ति) और त्याग (त्याग) का सर्वोच्च प्रतीक माना जाता है। उनका प्रेम भगवान कृष्ण के प्रति इतना गहरा और अनन्य था कि वे कृष्ण की हर इच्छा को अपनी इच्छा मानती थीं। राधा-कृष्ण का प्रेम केवल शारीरिक नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक और अलौकिक संबंध है, जो आत्मा के परमात्मा से मिलन को दर्शाता है। वे भक्तों को यह सिखाती हैं कि परमात्मा के प्रति सच्चा प्रेम ही मोक्ष का मार्ग है।
अष्ट सखियाँ
राधा रानी की आठ प्रमुख सखियाँ थीं, जिन्हें अष्टसखी के नाम से जाना जाता है। ये सखियाँ थीं - ललिता, विशाखा, चित्रा, इंदुलेखा, चम्पकलता, रंगदेवी, तुंगविद्या और सुदेवी। ये सभी राधा रानी की प्रिय सहचरी थीं और उनकी लीलाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती थीं। अष्टसखियों को भी राधा-कृष्ण के अभिन्न अंग के रूप में पूजा जाता है।
राधा अष्टमी का महत्व
राधा अष्टमी का पर्व हिंदू धर्म, विशेषकर वैष्णव संप्रदाय के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस दिन राधा रानी की पूजा-अर्चना करने से भक्तों को कई प्रकार के आध्यात्मिक और लौकिक लाभ प्राप्त होते हैं।
मोक्ष और समृद्धि
मान्यता है कि राधा अष्टमी का व्रत और पूजा करने से व्यक्ति के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। राधा रानी की कृपा से जीवन में सुख-समृद्धि, शांति और खुशहाली आती है। जो भक्त सच्चे मन से इस दिन राधा रानी की आराधना करते हैं, उन्हें भौतिक इच्छाओं की पूर्ति के साथ-साथ आध्यात्मिक उन्नति भी प्राप्त होती है।
अखंड सौभाग्य
विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और अखंड सौभाग्य के लिए राधा अष्टमी का व्रत रखती हैं। ऐसा माना जाता है कि राधा रानी की पूजा करने से वैवाहिक जीवन में प्रेम, सौहार्द और मधुरता बनी रहती है। अविवाहित कन्याएं उत्तम वर की प्राप्ति के लिए भी यह व्रत कर सकती हैं।
कृष्ण कृपा की प्राप्ति
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान कृष्ण राधा रानी के बिना अपनी कोई भी लीला पूर्ण नहीं करते। राधा रानी की पूजा किए बिना भगवान कृष्ण की पूर्ण कृपा प्राप्त करना असंभव माना जाता है। इसलिए, जो भक्त भगवान कृष्ण की पूर्ण कृपा चाहते हैं, उन्हें राधा अष्टमी के दिन राधा रानी की विशेष पूजा अवश्य करनी चाहिए। "राधा नाम जपने से कृष्ण दौड़े चले आते हैं।"
भक्ति मार्ग का प्रतीक
राधा रानी की कथा और उनका जीवन भक्तों को निष्ठावान और निस्वार्थ भक्ति का मार्ग सिखाता है। वे यह दर्शाती हैं कि प्रेम और समर्पण के माध्यम से कैसे परमात्मा को प्राप्त किया जा सकता है। यह पर्व भक्तों को अपनी आत्मा को शुद्ध करने और परमात्मा के साथ गहरा संबंध स्थापित करने के लिए प्रेरित करता है।
राधा अष्टमी पूजा विधि (विस्तृत जानकारी)
राधा अष्टमी के दिन राधा रानी की पूजा अत्यंत श्रद्धा और भक्ति के साथ की जाती है। यहाँ विस्तृत पूजा विधि दी गई है:
पूजा की तैयारी
- स्वच्छता और स्नान: पूजा से पूर्व प्रातःकाल उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। घर और पूजा स्थल को अच्छी तरह साफ करें।
- पूजा सामग्री: निम्नलिखित सामग्री एकत्र करें:
- राधा-कृष्ण की मूर्ति या तस्वीर
- जल से भरा कलश
- दीपक और घी
- धूप और अगरबत्ती
- पुष्प (गुलाब, कमल, चमेली) और माला
- फल (केला, सेब, आम आदि)
- मिठाई (खीर, मालपुआ, लड्डू, पेड़ा विशेष रूप से)
- पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, गंगाजल का मिश्रण)
- चंदन, रोली, कुमकुम, अक्षत
- तुलसी दल
- पान का पत्ता, सुपारी
- नए वस्त्र और आभूषण (यदि संभव हो)
- गंगाजल
- पीले रंग के वस्त्र (राधा रानी को प्रिय)
- रंगोली के रंग
- पूजा स्थल की स्थापना: पूजा स्थल पर एक चौकी या वेदी स्थापित करें। उस पर लाल या पीला वस्त्र बिछाएं। इसके ऊपर राधा-कृष्ण की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें।
पूजा प्रारंभ
- संकल्प: सबसे पहले हाथ में जल, फूल और अक्षत लेकर राधा रानी की पूजा का संकल्प लें। अपने नाम, गोत्र और पूजा के उद्देश्य का उच्चारण करें।
- कलश स्थापना: चौकी के पास एक कलश स्थापित करें। कलश में जल भरकर उसमें कुछ सिक्के, सुपारी, अक्षत, फूल डालें और उसके मुख पर आम के पत्ते लगाकर नारियल रखें।
- आवाहन: राधा रानी का ध्यान करते हुए उनका आह्वान करें। मंत्रों का उच्चारण करें।
- आसन: राधा-कृष्ण को आसन ग्रहण करने के लिए पुष्प अर्पित करें।
- स्नान (अभिषेक): राधा-कृष्ण की मूर्ति को पंचामृत से स्नान कराएं। इसके बाद शुद्ध जल से स्नान कराकर साफ वस्त्र से पोंछें।
- वस्त्र और आभूषण: राधा रानी को नए वस्त्र, चुनरी और आभूषण (यदि लाए हों) अर्पित करें।
- तिलक: राधा रानी को चंदन, रोली, कुमकुम और अक्षत से तिलक करें।
- पुष्प और माला: उन्हें सुगंधित पुष्प और फूलों की माला अर्पित करें।
- धूप और दीप: धूप और अगरबत्ती जलाएं और दीपक प्रज्वलित करें।
- भोग: राधा रानी को फल, मिठाई, विशेषकर खीर, मालपुआ और तुलसी दल सहित अन्य पकवानों का भोग लगाएं। याद रखें कि भगवान कृष्ण को तुलसी अत्यंत प्रिय है।
- मंत्र जाप: राधा रानी के मंत्रों का जाप करें। कुछ प्रमुख मंत्र हैं:
- "ॐ राधायै नमः"
- "ॐ ह्रीं राधिकायै नमः"
- "श्री राधे राधे"
- "हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे, हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे"
- राधा चालीसा और स्तुति: राधा चालीसा और राधा रानी की स्तुति का पाठ करें।
- आरती: अंत में राधा-कृष्ण की आरती करें।
- परिक्रमा: आरती के बाद राधा रानी की परिक्रमा करें (तीन या सात बार)।
- क्षमा प्रार्थना: पूजा में हुई किसी भी भूल-चूक के लिए क्षमा प्रार्थना करें।
- प्रसाद वितरण: पूजा समाप्त होने के बाद प्रसाद सभी भक्तों और परिवार के सदस्यों में वितरित करें।
व्रत का पालन
राधा अष्टमी के दिन भक्त पूरे दिन उपवास रखते हैं। कुछ भक्त निर्जला व्रत रखते हैं, जबकि कुछ फलाहार व्रत का पालन करते हैं, जिसमें वे केवल फल और दूध का सेवन करते हैं। व्रत का पारण अगले दिन सूर्योदय के बाद किया जाता है, जब पूजा पूर्ण हो जाती है। व्रत के दौरान ब्रह्मचर्य का पालन करें और सात्विक विचारों में लीन रहें।
राधा अष्टमी व्रत कथा
राधा अष्टमी के पावन अवसर पर राधा रानी के जन्म और उनके महत्व से जुड़ी कथा का श्रवण करना अत्यंत शुभ माना जाता है। यहाँ एक प्रचलित व्रत कथा दी गई है:
पौराणिक काल में एक समय की बात है, जब भगवान विष्णु पृथ्वी पर कृष्ण के रूप में अवतार लेने वाले थे, तब उनकी प्रिय शक्ति, देवी राधा ने भी मनुष्य रूप में अवतरित होने का निश्चय किया। मथुरा के पास बरसाना नामक एक सुंदर गाँव में, वृषभानु नाम के एक धनी और धर्मात्मा गोप रहते थे। उनकी पत्नी का नाम कीर्तिदा था। संतानहीन होने के कारण वे दोनों अत्यंत दुखी रहते थे और हमेशा भगवान से संतान प्राप्ति की प्रार्थना करते थे।
एक दिन वृषभानु जी जब स्नान के लिए यमुना नदी में गए, तो उन्होंने देखा कि एक अद्भुत कमल का फूल पानी में तैर रहा है, जो हजारों सूर्यों के समान चमक रहा था। उस कमल के केंद्र में एक सुंदर कन्या लेटी हुई थी, जिसका मुखमंडल दिव्य तेज से प्रकाशित हो रहा था। वृषभानु जी उस कन्या को देखकर आश्चर्यचकित रह गए और भगवान की महिमा का गुणगान करते हुए उस कन्या को अपने घर ले आए। यह कन्या कोई और नहीं, स्वयं देवी राधा थीं।
वृषभानु और कीर्तिदा ने उस कन्या को अपनी पुत्री मानकर अत्यंत प्रेम से उसका पालन-पोषण करना शुरू किया। हालाँकि, एक रहस्य था - जब राधा का जन्म हुआ, तब उनकी आँखें बंद थीं। उन्होंने अपनी आँखें नहीं खोलीं, जिससे वृषभानु और कीर्तिदा चिंतित रहते थे कि उनकी बेटी देख नहीं सकती। उन्होंने कई वैद्य और ज्योतिषियों को दिखाया, लेकिन कोई भी कारण नहीं बता पाया।
कुछ समय बाद, भगवान कृष्ण ने भी नंद गाँव में जन्म लिया। जब कृष्ण कुछ बड़े हुए और यशोदा मैया उन्हें गोद में लेकर वृषभानु जी के घर बरसाना आईं, तो एक चमत्कार हुआ। जैसे ही नन्हे कृष्ण को राधा के पास लाया गया, राधा ने पहली बार अपनी आँखें खोलीं। उनकी पहली दृष्टि सीधे भगवान कृष्ण पर पड़ी। यह देखकर सभी लोग हतप्रभ रह गए और समझ गए कि यह साधारण कन्या नहीं, बल्कि किसी दिव्य शक्ति का अवतार है। इस घटना ने यह सिद्ध कर दिया कि राधा का जन्म केवल कृष्ण के लिए हुआ था और उनका प्रेम अनादि और अविनाशी है।
तभी से, राधा अष्टमी का पर्व राधा रानी के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाने लगा। इस दिन व्रत रखने और पूजा करने से राधा रानी और भगवान कृष्ण दोनों की कृपा प्राप्त होती है। यह कथा हमें राधा-कृष्ण के प्रेम की दिव्यता और भक्ति के महत्व को सिखाती है।
राधा अष्टमी के धार्मिक पहलू और मान्यताएं
राधा अष्टमी का पर्व सिर्फ एक जन्मोत्सव नहीं, बल्कि अनेक गहरे धार्मिक पहलुओं और मान्यताओं से जुड़ा है जो इसे और भी महत्वपूर्ण बनाते हैं।
अखंड प्रेम का प्रतीक
राधा और कृष्ण का संबंध लौकिक प्रेम से परे है। यह आत्मा और परमात्मा के मिलन, भक्त और भगवान के एकात्म का प्रतीक है। राधा अष्टमी इस अखंड, निस्वार्थ और दिव्य प्रेम को स्मरण करने का दिन है। यह प्रेम हमें सिखाता है कि भौतिक आकर्षण क्षणभंगुर है, जबकि आध्यात्मिक प्रेम शाश्वत है।
वैष्णव धर्म में स्थान
वैष्णव संप्रदाय, विशेषकर गौड़ीय वैष्णव धर्म में राधा रानी को सर्वोच्च देवी और भगवान कृष्ण की ह्लादिनी शक्ति (आनंद स्वरूप शक्ति) के रूप में पूजा जाता है। इस संप्रदाय में माना जाता है कि राधा रानी की सेवा और पूजा के बिना भगवान कृष्ण की पूर्ण भक्ति और कृपा प्राप्त नहीं की जा सकती। इसलिए राधा अष्टमी का पर्व वैष्णवों के लिए अत्यंत पवित्र और अनिवार्य माना जाता है।
मनोकामना पूर्ति
यह मान्यता है कि राधा अष्टमी के दिन सच्चे मन से राधा रानी की पूजा करने और व्रत रखने से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। निःसंतान दंपत्ति संतान प्राप्ति के लिए, अविवाहित लोग उत्तम जीवनसाथी के लिए, और धन-धान्य की इच्छा रखने वाले लोग समृद्धि के लिए इस दिन विशेष प्रार्थना करते हैं।
पापों से मुक्ति
गरुड़ पुराण और नारद पुराण जैसे कई धर्मग्रंथों में राधा अष्टमी के व्रत के महत्व का वर्णन किया गया है। माना जाता है कि इस दिन व्रत रखने और श्रद्धापूर्वक पूजा करने से व्यक्ति के ज्ञात और अज्ञात सभी पापों का नाश होता है। उसे सभी कष्टों से मुक्ति मिलती है और जीवन में शांति व सकारात्मकता का संचार होता है।
भक्ति और समर्पण का आदर्श
राधा रानी का जीवन और उनकी कृष्ण भक्ति सभी भक्तों के लिए एक आदर्श है। उन्होंने प्रेम और समर्पण का ऐसा उदाहरण प्रस्तुत किया, जो सदियों से भक्तों को प्रेरित करता रहा है। राधा अष्टमी का पर्व भक्तों को अपनी भक्ति को और गहरा करने तथा अपने जीवन को आध्यात्मिक मार्ग पर आगे बढ़ाने की प्रेरणा देता है।
निष्कर्ष
राधा अष्टमी का पावन पर्व, जो 2026 में 31 अगस्त को मनाया जाएगा, राधा रानी के दिव्य अवतरण और उनके अनंत प्रेम का उत्सव है। यह दिन भक्तों को न केवल राधा रानी के जन्म की खुशी मनाने का अवसर देता है, बल्कि उन्हें उनके निस्वार्थ प्रेम, भक्ति और त्याग के आदर्शों को अपने जीवन में उतारने की प्रेरणा भी देता है। राधा रानी की पूजा करने से भगवान कृष्ण भी अत्यंत प्रसन्न होते हैं और भक्तों को सुख, समृद्धि, मोक्ष तथा अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है।
इस पवित्र दिन पर, आइए हम सभी श्रद्धा और भक्ति के साथ राधा रानी की आराधना करें, उनके नाम का जाप करें और उनके दिव्य प्रेम को अपने हृदय में धारण करें। राधा अष्टमी का यह पर्व आपके जीवन में नई ऊर्जा, सकारात्मकता और आध्यात्मिक उन्नति लेकर आए।
जय श्री राधे!
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
Q: राधा अष्टमी का पर्व क्यों मनाया जाता है?
राधा अष्टमी का पर्व भगवान कृष्ण की प्रियसी और उनकी शक्ति स्वरूपा देवी राधा रानी के जन्मोत्सव के रूप में अत्यंत श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है।
Q: वर्ष 2026 में राधा अष्टमी कब मनाई जाएगी?
वर्ष 2026 में, राधा अष्टमी का पावन पर्व सोमवार, 31 अगस्त 2026 को मनाया जाएगा।
Q: राधा अष्टमी किस तिथि को मनाई जाती है?
राधा अष्टमी का पर्व हर साल भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है।
Q: राधा अष्टमी का जन्माष्टमी से क्या संबंध है?
राधा अष्टमी भगवान कृष्ण के जन्मोत्सव (जन्माष्टमी) के ठीक 15 दिन बाद आती है। कृष्ण जन्माष्टमी भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मनाई जाती है, जबकि राधा अष्टमी भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी को।
Q: 2026 में राधा अष्टमी की अष्टमी तिथि कब से कब तक रहेगी?
अष्टमी तिथि प्रारंभ 30 अगस्त 2026, रविवार को रात्रि लगभग 09:20 बजे से होगी और 31 अगस्त 2026, सोमवार को रात्रि लगभग 10:35 बजे तक समाप्त होगी।
Q: राधा अष्टमी 2026 में पूजा का मध्यान मुहूर्त क्या है?
31 अगस्त 2026, सोमवार को दोपहर 12:00 बजे से 01:00 बजे तक (लगभग) पूजा का मध्यान मुहूर्त रहेगा।
Q: राधा रानी कौन हैं और उन्हें किन अन्य नामों से जाना जाता है?
राधा रानी, जिन्हें राधिका, राधारानी और किशोरी जी के नाम से भी जाना जाता है, भगवान श्रीकृष्ण की अनंत शक्ति और उनकी प्रमुख प्रियसी हैं। वे प्रेम, सौंदर्य, भक्ति और करुणा की साक्षात मूर्ति हैं।
Q: पौराणिक कथाओं के अनुसार राधा रानी का जन्म कहाँ और किनके घर हुआ था?
पौराणिक कथाओं के अनुसार, राधा रानी का जन्म वृषभानु और कीर्तिदा (कीर्ति) नामक एक धनी गोप दंपति के घर बरसाना नामक गाँव में हुआ था।
Q: राधा अष्टमी पर राधा रानी की पूजा करने का क्या महत्व है?
इस विशेष दिन पर राधा रानी की पूजा-अर्चना करने से भगवान कृष्ण भी प्रसन्न होते हैं और भक्तों को असीम सुख, समृद्धि और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
Q: राधा अष्टमी पर पूजा का विधान मुख्य रूप से मध्यान काल में क्यों किया जाता है?
राधा अष्टमी पर पूजा का विधान मुख्य रूप से मध्यान काल (दोपहर) में किया जाता है, क्योंकि पौराणिक मान्यताओं के अनुसार राधा रानी का जन्म इसी समय हुआ था।
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