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संतोषी माता व्रत 18 सितंबर 2026: तिथि, शुभ मुहूर्त और मनोकामना पूर्ति के लाभ

संतोषी माता व्रत 18 सितंबर 2026: तिथि, शुभ मुहूर्त और मनोकामना पूर्ति के लाभ

सनातन धर्म में व्रतों और त्योहारों का विशेष महत्व है, जो न केवल हमारी आस्था को मजबूत करते हैं, बल्कि हमें आत्म-शुद्धि और मानसिक शांति भी प्रदान करते हैं। इन्हीं पवित्र व्रतों में से एक है संतोषी माता व्रत, जिसे शुक्रवार के दिन श्रद्धापूर्वक रखा जाता है। यह व्रत सुख-समृद्धि, धन-धान्य और मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए अत्यंत फलदायी माना जाता है। वर्ष 2026 में, संतोषी माता का यह पावन व्रत 18 सितंबर, शुक्रवार को पड़ रहा है, जो भक्तों के लिए माता की कृपा प्राप्त करने का एक अद्भुत अवसर है।

इस ब्लॉग पोस्ट में, हम संतोषी माता व्रत की विस्तृत जानकारी प्रदान करेंगे – जिसमें इसकी तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, आवश्यक सामग्री, व्रत कथा, उद्यापन विधि, और इस व्रत से मिलने वाले अनमोल लाभ शामिल हैं। यदि आप भी संतोषी माता की कृपा प्राप्त करना चाहते हैं, तो यह मार्गदर्शिका आपके लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध होगी।

संतोषी माता कौन हैं?

संतोषी माता, जिन्हें संतोष की देवी के रूप में पूजा जाता है, भगवान गणेश की पुत्री हैं। उनकी उत्पत्ति का वर्णन पौराणिक कथाओं में मिलता है, जहां बताया गया है कि भगवान गणेश के दो पुत्र, शुभ और लाभ, जब अपनी बुआ से राखी बंधवाते देखते हैं, तो उन्हें भी एक बहन की इच्छा होती है। उनकी इच्छा पर, गणेश जी ने अपनी दो पत्नियों, रिद्धि और सिद्धि, की योगमाया से एक कन्या को उत्पन्न किया, जिनका नाम संतोषी रखा गया। संतोषी माता का नाम ही उनके स्वरूप को दर्शाता है – जो संतोष, धैर्य और शांति प्रदान करती हैं। वे अपने भक्तों की सभी इच्छाओं को पूर्ण करती हैं और उन्हें जीवन में सुख-शांति का मार्ग दिखाती हैं।

संतोषी माता व्रत का महत्व

संतोषी माता का व्रत विशेष रूप से महिलाओं द्वारा किया जाता है, यद्यपि पुरुष भी इसे कर सकते हैं। यह व्रत 16 शुक्रवारों तक लगातार रखा जाता है और इसका मुख्य उद्देश्य जीवन में संतोष, धैर्य और सुख-समृद्धि लाना है। जो भक्त पूर्ण श्रद्धा और विश्वास के साथ इस व्रत को करते हैं, संतोषी माता उनकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण करती हैं। अविवाहित कन्याओं को उत्तम वर की प्राप्ति होती है, विवाहित महिलाओं को सुखमय दांपत्य जीवन और संतान सुख मिलता है, तथा सभी भक्तों को आर्थिक समस्याओं से मुक्ति और घर में खुशहाली प्राप्त होती है। इस व्रत में खट्टी चीजों का सेवन वर्जित होता है, जो इंद्रियों पर नियंत्रण और त्याग का प्रतीक है।

संतोषी माता व्रत 18 सितंबर 2026: तिथि और शुभ मुहूर्त

वर्ष 2026 में, संतोषी माता का व्रत 18 सितंबर, शुक्रवार को पड़ रहा है। शुक्रवार का दिन संतोषी माता को समर्पित है, इसलिए इस दिन व्रत रखना विशेष फलदायी माना जाता है।

तिथि

  • संतोषी माता व्रत तिथि: 18 सितंबर 2026, शुक्रवार

शुभ मुहूर्त

संतोषी माता की पूजा के लिए सामान्यतः शुक्रवार का पूरा दिन ही शुभ माना जाता है, विशेषकर सुबह और शाम का समय। 18 सितंबर 2026 को पूजा के लिए आप निम्नलिखित समय का उपयोग कर सकते हैं:

  • ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 04:30 बजे से 05:15 बजे तक (यह ध्यान और प्रार्थना के लिए अत्यंत शुभ समय है)।
  • सुबह का शुभ मुहूर्त: सुबह 06:00 बजे से 10:30 बजे तक।
  • दोपहर का शुभ मुहूर्त: दोपहर 12:00 बजे से 01:30 बजे तक (अभिजीत मुहूर्त)।
  • शाम का शुभ मुहूर्त: शाम 06:00 बजे से 07:30 बजे तक (प्रदोष काल, आरती के लिए उत्तम)।

व्रतधारी अपनी सुविधा और स्थानीय पंचांग के अनुसार इन समयों में से किसी एक का चयन कर सकते हैं। महत्वपूर्ण यह है कि पूजा पूरी श्रद्धा और विधि-विधान के साथ की जाए।

संतोषी माता व्रत की पूजा विधि

संतोषी माता का व्रत रखने के लिए कुछ विशेष नियमों और विधियों का पालन करना आवश्यक है। यह व्रत शुक्रवार को किया जाता है और 16 शुक्रवार तक रखा जाता है।

व्रत संकल्प

व्रत के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके बाद पूजा स्थान को शुद्ध करें और हाथ में जल, फूल और अक्षत लेकर संतोषी माता के समक्ष अपने व्रत का संकल्प लें। मन ही मन माता से अपनी मनोकामना पूर्ण करने की प्रार्थना करें।

सामग्री सूची

संतोषी माता की पूजा के लिए निम्नलिखित सामग्री की आवश्यकता होती है:

  • संतोषी माता की प्रतिमा या चित्र
  • गणेश जी की प्रतिमा (यदि उपलब्ध हो)
  • पूजा चौकी या पाटा
  • लाल रंग का वस्त्र (माता को चढ़ाने के लिए या चौकी पर बिछाने के लिए)
  • तांबे या पीतल का कलश
  • गंगाजल या शुद्ध जल
  • ताजे फूल और पुष्पमाला
  • धूप, दीप, अगरबत्ती
  • कुमकुम, रोली, हल्दी, अक्षत
  • नारियल (कलश पर रखने के लिए)
  • गुड़ और चना (माता का विशेष प्रिय प्रसाद)
  • एक कटोरी या बर्तन में गुड़ और चने (पूजा के दौरान कथा सुनने वालों के लिए)
  • केले, अमरूद या अन्य मौसमी फल
  • मिठाई (खट्टी नहीं होनी चाहिए)
  • श्रृंगार सामग्री (बिंदी, चूड़ी, मेहंदी, सिंदूर आदि)
  • दीपक के लिए घी या तेल और बाती
  • कपूर (आरती के लिए)
  • लोटे में शुद्ध जल (पूजा के बाद विसर्जन के लिए)
  • संतोषी माता व्रत कथा की पुस्तक

स्थापना और पूजा विधि

  1. स्थान की शुद्धि: सबसे पहले पूजा स्थान को गंगाजल छिड़ककर शुद्ध करें। एक चौकी पर लाल वस्त्र बिछाएं।
  2. माता की स्थापना: चौकी पर संतोषी माता की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। यदि उपलब्ध हो तो गणेश जी की प्रतिमा भी साथ में रखें।
  3. कलश स्थापना: माता के बाईं ओर एक कलश स्थापित करें। कलश में जल भरें, उसमें कुछ सिक्के, सुपारी, अक्षत और दूर्वा डालें। कलश के मुख पर आम के पत्ते लगाकर उस पर नारियल रखें। कलश के ऊपर एक लाल चुनरी या वस्त्र लपेट दें।
  4. दीप प्रज्वलन: माता के सामने घी का दीपक प्रज्वलित करें। धूप और अगरबत्ती जलाएं।
  5. तिलक और श्रृंगार: माता को रोली, कुमकुम का तिलक लगाएं। उन्हें पुष्पमाला पहनाएं और श्रृंगार सामग्री अर्पित करें। गणेश जी को भी तिलक करें।
  6. नैवेद्य अर्पण: माता को गुड़ और चने का प्रसाद अर्पित करें। इसके साथ ही फल और मिठाई भी चढ़ाएं। ध्यान रहे, खट्टी चीजें वर्जित हैं।
  7. व्रत कथा श्रवण: एक कटोरी में गुड़ और चने लेकर व्रत कथा पढ़ें या सुनें। कथा सुनते समय सभी उपस्थित लोग (जो व्रत कर रहे हों) अपने हाथ में गुड़-चना रखें।
  8. आरती: कथा समाप्त होने के बाद संतोषी माता की आरती करें। आरती के बाद सभी को गुड़-चने का प्रसाद बांटें।
  9. जल अर्पण: अंत में, जिस लोटे में आपने जल रखा था, उस जल को किसी पौधे में अर्पित कर दें। जल अर्पण के समय 'जय संतोषी मां' का जाप करें।
  10. भोजन: व्रत के दौरान केवल एक समय भोजन करें, और उसमें खट्टी चीजों का सेवन बिल्कुल न करें। फल और दूध का सेवन कर सकते हैं।

संतोषी माता व्रत कथा

संतोषी माता व्रत की कथा बहुत ही प्रेरणादायक और मनोरंजक है, जो भक्तों को धैर्य, त्याग और विश्वास का महत्व सिखाती है। यह कथा इस प्रकार है:

एक बुढ़िया थी, जिसके सात बेटे थे। छह बेटे कमाते थे, लेकिन सातवां बेटा निकम्मा था। बुढ़िया अपने छह बेटों को अच्छा भोजन देती और सातवें बेटे को जूठन खिलाती थी। एक दिन सातवीं बहू यह सब देख रही थी और उसे बहुत दुःख हुआ। उसने अपनी सास से पूछा कि वह उसके पति के साथ ऐसा व्यवहार क्यों करती है। सास ने कहा कि तुम्हारा पति कुछ कमाता नहीं है, इसलिए उसे यही मिलेगा।

यह बात सातवें बेटे को भी पता चली और उसे भी बहुत दुःख हुआ। उसने अपनी पत्नी से कहा, "तुम मुझे कमाने जाने दो।" पत्नी ने कहा, "ठीक है, लेकिन आप जल्दी लौट आना।" सातवां बेटा परदेस चला गया। परदेस में वह खूब धन कमाता है, लेकिन धन के मद में वह अपनी पत्नी और मां को भूल जाता है।

इधर, उसकी पत्नी बहुत दुःखी रहती थी। उसे खाने को भी कुछ नहीं मिलता था। वह सूखी रोटी खाकर और पानी पीकर गुजारा करती थी। एक दिन उसकी पड़ोसिन उसे संतोषी माता का व्रत करने की सलाह देती है। वह पड़ोसिन के साथ शुक्रवार के दिन संतोषी माता के मंदिर जाती है और व्रत रखने का संकल्प लेती है। वह 16 शुक्रवार तक संतोषी माता का व्रत रखती है, जिसमें खट्टी चीजों से परहेज करती है और गुड़-चने का भोग लगाती है।

माता के आशीर्वाद से, उसके पति को अपनी पत्नी की याद आती है। वह अपनी सारी कमाई लेकर घर लौट आता है। घर आकर देखता है कि उसकी पत्नी तो बहुत दुःखी और पतली हो गई है। वह अपनी पत्नी को गले लगाता है और उससे कहता है कि "मैंने बहुत धन कमाया है, अब हम सुख से रहेंगे।"

पत्नी खुशी से झूम उठती है। अब वह अपने घर में सुखी जीवन व्यतीत करने लगती है। जब उसके 16 व्रत पूरे हो जाते हैं, तो वह उद्यापन की तैयारी करती है। उद्यापन में वह घर पर पूरी और खीर बनाती है। उसके देवरानियां खट्टी चीज खाकर उसे चिढ़ाने लगती हैं, ताकि उसका व्रत खंडित हो जाए। लेकिन वह दृढ़ रहती है।

उद्यापन के दिन, वह ब्राह्मणों और कन्याओं को भोजन कराती है। उसकी देवरानियां बच्चों को पैसे देकर खट्टी चीजें खाने भेज देती हैं। बच्चे पैसे लेकर इमली खाने बाजार जाते हैं। लौटते समय उनके पैर फिसल जाते हैं और वे सब गिरकर लहूलुहान हो जाते हैं। जब यह बात पत्नी को पता चलती है, तो वह बहुत दुःखी होती है और संतोषी माता से क्षमा याचना करती है। माता उससे प्रसन्न होकर बच्चों को पुनः स्वस्थ कर देती हैं।

इस घटना के बाद सभी को संतोषी माता की महिमा पर विश्वास हो जाता है। तभी से संतोषी माता का व्रत श्रद्धापूर्वक किया जाने लगा। माता सभी भक्तों पर अपनी कृपा बरसाती हैं और उनकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण करती हैं।

संतोषी माता व्रत के नियम

संतोषी माता का व्रत करते समय कुछ विशेष नियमों का पालन करना अत्यंत आवश्यक है। इन नियमों का पालन करने से ही व्रत का पूर्ण फल प्राप्त होता है।

क्या करें:

  • सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
  • व्रत का संकल्प लें और पूरी श्रद्धा व भक्ति से पूजा करें।
  • पूजा में गुड़ और चने का प्रसाद अवश्य चढ़ाएं और इसे ही मुख्य प्रसाद के रूप में ग्रहण करें।
  • दिनभर संतोषी माता का ध्यान करें और 'जय संतोषी माता' का जाप करें।
  • एक समय सात्विक भोजन ग्रहण करें (बिना खट्टी चीज के)।
  • गाय को रोटी खिलाएं या पक्षियों को दाना डालें।
  • उद्यापन के दिन ब्राह्मणों और कन्याओं को भोजन कराएं।
  • घर में शांतिपूर्ण और धार्मिक वातावरण बनाए रखें।

क्या न करें:

  • खट्टी चीजों का सेवन पूर्ण रूप से वर्जित है। इसमें नींबू, इमली, टमाटर, अचार, दही आदि सभी खट्टी चीजें शामिल हैं।
  • खट्टी चीजें किसी और को भी न दें और न ही घर में किसी को खाते देखें (यदि संभव हो)।
  • झूठ न बोलें, किसी की निंदा न करें और क्रोध न करें।
  • तामसिक भोजन (मांस, मदिरा, प्याज, लहसुन) का सेवन न करें।
  • किसी भी प्रकार का अपशब्द या कटु वचन न बोलें।
  • ब्रह्मचर्य का पालन करें।

व्रत का उद्यापन विधि

संतोषी माता का व्रत आमतौर पर 16 शुक्रवार तक लगातार किया जाता है। जब आपके 16 शुक्रवार के व्रत पूर्ण हो जाएं, तो आपको व्रत का उद्यापन करना अनिवार्य है। उद्यापन के बिना व्रत अधूरा माना जाता है।

उद्यापन की विधि:

  1. 16वें शुक्रवार को सामान्य व्रत पूजा विधि का पालन करें।
  2. पूजा के बाद, 8 बालकों या 8 ब्राह्मणों (या दोनों का मिश्रण) को भोजन के लिए आमंत्रित करें। यदि 8 उपलब्ध न हों, तो अपनी सामर्थ्य अनुसार 2, 4 या 5 को भी भोजन करा सकते हैं।
  3. भोजन में पूरी, खीर, चने की सब्जी (बिना खट्टी) और हलवा बनाएं। सुनिश्चित करें कि भोजन में किसी भी प्रकार की खट्टी चीज शामिल न हो।
  4. भोजन कराने के बाद सभी को यथाशक्ति दान-दक्षिणा दें।
  5. अपनी क्षमतानुसार संतोषी माता को एक लाल चुनरी और नारियल अर्पित करें।
  6. उद्यापन के दिन भी स्वयं और परिवार के सभी सदस्य खट्टी चीजों से परहेज करें।
  7. भगवान गणेश की भी पूजा करें और उनसे और संतोषी माता से अपने व्रत की सफलता और मनोकामना पूर्ति के लिए प्रार्थना करें।

मनोकामना पूर्ति और संतोषी माता की कृपा

संतोषी माता का व्रत सच्चे मन और पूर्ण श्रद्धा से करने पर व्यक्ति की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। यह व्रत विशेष रूप से निम्नलिखित लाभ प्रदान करता है:

  • सुख-समृद्धि: घर में धन-धान्य की वृद्धि होती है और आर्थिक समस्याएं दूर होती हैं।
  • शांत घर: पारिवारिक कलह दूर होकर घर में शांति और प्रेम का वातावरण बनता है।
  • संतान सुख: जिन दंपत्तियों को संतान सुख प्राप्त नहीं हो रहा है, उन्हें माता के आशीर्वाद से संतान की प्राप्ति होती है।
  • उत्तम वैवाहिक जीवन: अविवाहित कन्याओं को योग्य वर मिलता है और विवाहित महिलाओं का दांपत्य जीवन मधुर बनता है।
  • रोग मुक्ति: गंभीर बीमारियों से मुक्ति मिलती है और शारीरिक स्वास्थ्य बेहतर होता है।
  • नकारात्मकता का नाश: जीवन से नकारात्मक ऊर्जाएं दूर होती हैं और सकारात्मकता का संचार होता है।
  • आत्मिक शांति: मन को असीम शांति और संतोष प्राप्त होता है।

संतोषी माता की कृपा पाने के लिए सबसे महत्वपूर्ण है शुद्ध हृदय, अटूट विश्वास और व्रत के नियमों का ईमानदारी से पालन करना। जो भक्त दृढ़ता से इन नियमों का पालन करते हैं, माता उनकी पुकार अवश्य सुनती हैं और उन्हें अपने आशीर्वाद से परिपूर्ण करती हैं।

संतोषी माता के स्वरूप का ध्यान

पूजा करते समय या ध्यान करते समय संतोषी माता के स्वरूप का स्मरण करना अत्यंत फलदायी होता है। संतोषी माता का स्वरूप अत्यंत मनोहारी और शांत है:

  • वे कमल के आसन पर विराजमान हैं।
  • उनके चार हाथ हैं, जिनमें से दो हाथों में उन्होंने त्रिशूल और तलवार धारण की हुई है, जो नकारात्मक शक्तियों के नाश और धर्म की रक्षा का प्रतीक है।
  • अन्य दो हाथों में वे वरदान और अभय मुद्रा में हैं, जो भक्तों को आशीर्वाद और भय से मुक्ति का आश्वासन देती हैं।
  • वे श्वेत वस्त्र धारण करती हैं, जो पवित्रता और शांति का प्रतीक है।
  • उनके माथे पर लाल बिंदी शोभायमान है।
  • उनका वाहन मूषक (चूहा) है, जो उनकी विनम्रता और हर छोटे जीव के प्रति प्रेम को दर्शाता है।

संतोषी माता का ध्यान करते हुए उनके इस शांत और करुणामयी स्वरूप का स्मरण करें और अपनी इच्छाएं उनके समक्ष रखें।

निष्कर्ष

संतोषी माता का व्रत एक शक्तिशाली और पवित्र अनुष्ठान है जो जीवन में सुख, शांति और समृद्धि लाने की क्षमता रखता है। 18 सितंबर 2026 को पड़ने वाले इस विशेष शुक्रवार को, सभी भक्तों को इस पावन अवसर का लाभ उठाना चाहिए। पूर्ण श्रद्धा, भक्ति और निष्ठा के साथ किए गए इस व्रत से संतोषी माता निश्चित रूप से प्रसन्न होती हैं और अपने भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण करती हैं। याद रखें, व्रत का सबसे महत्वपूर्ण पहलू नियमों का पालन करना और हृदय में सच्ची आस्था बनाए रखना है। जय संतोषी माता!

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

Q: संतोषी माता व्रत 2026 में किस तारीख को है?

वर्ष 2026 में संतोषी माता का पावन व्रत 18 सितंबर, शुक्रवार को है।

Q: संतोषी माता कौन हैं?

संतोषी माता, जिन्हें संतोष की देवी के रूप में पूजा जाता है, भगवान गणेश की पुत्री हैं। उनकी उत्पत्ति भगवान गणेश की दो पत्नियों, रिद्धि और सिद्धि, की योगमाया से हुई थी।

Q: संतोषी माता व्रत का मुख्य महत्व क्या है?

यह व्रत सुख-समृद्धि, धन-धान्य, आत्म-शुद्धि, मानसिक शांति और भक्तों की मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए अत्यंत फलदायी माना जाता है।

Q: संतोषी माता व्रत से मिलने वाले प्रमुख लाभ क्या हैं?

इस व्रत से अविवाहित कन्याओं को उत्तम वर, विवाहित महिलाओं को सुखमय दांपत्य जीवन और संतान सुख, तथा सभी भक्तों को आर्थिक समस्याओं से मुक्ति और घर में खुशहाली प्राप्त होती है।

Q: संतोषी माता का व्रत कितने शुक्रवार तक रखा जाता है?

संतोषी माता का व्रत 16 शुक्रवारों तक लगातार श्रद्धा और विश्वास के साथ रखा जाता है।

Q: संतोषी माता व्रत के दौरान किन चीजों का सेवन वर्जित होता है?

इस व्रत में खट्टी चीजों का सेवन वर्जित होता है, जो इंद्रियों पर नियंत्रण और त्याग का प्रतीक है।

Q: 18 सितंबर 2026 को संतोषी माता की पूजा के लिए शुभ मुहूर्त कौन-कौन से हैं?

18 सितंबर 2026 को पूजा के लिए ब्रह्म मुहूर्त (सुबह 04:30 बजे से 05:15 बजे तक), सुबह का शुभ मुहूर्त (सुबह 06:00 बजे से 10:30 बजे तक), दोपहर का शुभ मुहूर्त (दोपहर 12:00 बजे से 01:30 बजे तक), और शाम का शुभ मुहूर्त (शाम 06:00 बजे से 07:30 बजे तक) उपलब्ध हैं।

Q: क्या पुरुष भी संतोषी माता का व्रत कर सकते हैं?

यद्यपि यह व्रत विशेष रूप से महिलाओं द्वारा किया जाता है, पुरुष भी इसे पूर्ण श्रद्धा और विश्वास के साथ कर सकते हैं।

Q: संतोषी माता का व्रत किस वार को रखा जाता है?

संतोषी माता का व्रत विशेष रूप से शुक्रवार के दिन रखा जाता है, क्योंकि यह दिन संतोषी माता को समर्पित है।

Q: संतोषी माता के नाम का क्या अर्थ है?

संतोषी माता का नाम ही उनके स्वरूप को दर्शाता है – जो संतोष, धैर्य और शांति प्रदान करती हैं।

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प्रार्थना संपादकीय टीम

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