कृष्ण जन्म की संपूर्ण कथा: जन्माष्टमी क्यों मनाई जाती है और इसके पीछे क्या है कहानी?
- द्वारा प्रार्थना संपादकीय टीम
- प्रकाशित: August 29, 2026
- अंतिम अपडेट: August 29, 2026
- 10 Mins

भारतवर्ष एक ऐसा देश है जहाँ हर दिन कोई न कोई पर्व, कोई न कोई उत्सव मनाया जाता है। इन सभी त्योहारों में से एक अत्यंत महत्वपूर्ण और हर्षोल्लास भरा पर्व है जन्माष्टमी। यह पर्व भगवान विष्णु के आठवें अवतार, मर्यादा पुरुषोत्तम श्री कृष्ण के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। हर साल भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को यह पवित्र दिन आता है और पूरे देश को भक्ति के रंग में सराबोर कर देता है। इस लेख में हम जन्माष्टमी के पावन अवसर पर भगवान कृष्ण के जन्म की संपूर्ण कथा, इसके महत्व और इसे मनाने की विधि का विस्तृत वर्णन करेंगे।
कृष्ण जन्म कथा का पृष्ठभूमि: अत्याचार से मुक्ति की पुकार
मथुरा का क्रूर शासक कंस
बहुत समय पहले की बात है, मथुरा नगरी पर उग्रसेन का पुत्र कंस नामक एक अत्यंत क्रूर और अत्याचारी राजा राज करता था। कंस ने अपने पिता को कारागार में डालकर सिंहासन हथिया लिया था और अपनी प्रजा पर अनगिनत अत्याचार ढा रहा था। उसके अत्याचारों से पृथ्वी त्राहि-त्राहि कर रही थी और समस्त देवी-देवता भी चिंतित थे। कंस के आतंक से चारों ओर भय और निराशा का माहौल था।
देवकी और वासुदेव का विवाह
कंस की एक बहन थी, जिसका नाम देवकी था। देवकी अत्यंत धर्मनिष्ठ और सुशील कन्या थीं। उनका विवाह यादव वंश के एक वीर और धर्मपरायण पुरुष वासुदेव से हुआ। विवाह के पश्चात जब कंस अपनी बहन देवकी और अपने बहनोई वासुदेव को रथ में बिठाकर स्वयं उन्हें विदा करने जा रहा था, तभी एक अद्भुत घटना घटी। आकाशवाणी हुई।
आकाशवाणी और कंस का क्रूर निर्णय
रथ के ऊपर आकाश में एक दिव्य वाणी गूँजी, जिसने कंस के हृदय को भयभीत कर दिया। आकाशवाणी ने कहा, "हे कंस! जिस बहन को तू इतने प्रेम से विदा कर रहा है, उसी के आठवें गर्भ से उत्पन्न संतान तेरा वध करेगी।" इस आकाशवाणी को सुनकर कंस क्रोध से आग बबूला हो गया। उसने तुरंत अपनी तलवार निकाली और देवकी का वध करने के लिए उद्यत हो गया।
वासुदेव ने कंस को रोकने के लिए उससे विनती की और उसे समझाया कि देवकी का कोई दोष नहीं है। उन्होंने कंस को यह भी वचन दिया कि देवकी के गर्भ से जो भी संतान उत्पन्न होगी, उसे वे तुरंत कंस को सौंप देंगे। कंस, जो अपनी बहन को मारने का पाप नहीं करना चाहता था, वासुदेव के इस प्रस्ताव पर सहमत हो गया। लेकिन उसने देवकी और वासुदेव दोनों को कारागार में डाल दिया और उन पर कड़ी पहरा बिठा दिया।
कारागार में दुःख और योगमाया का प्रभाव
देवकी के सात बच्चों का वध
कारागार में रहते हुए देवकी ने एक-एक करके सात संतानों को जन्म दिया। और हर बार, वासुदेव अपने वचन के अनुसार, उस नवजात शिशु को कंस को सौंप देते थे। कंस ने बिना किसी दया के उन सभी सात शिशुओं का वध कर दिया। माता-पिता के रूप में देवकी और वासुदेव के लिए यह अत्यंत हृदयविदारक क्षण था। वे हर पल भय और शोक में डूबे रहते थे।
सातवें गर्भ के समय, भगवान विष्णु की योगमाया के प्रभाव से देवकी का सातवां गर्भ रोहिणी के गर्भ में स्थानांतरित हो गया। रोहिणी वासुदेव की दूसरी पत्नी थीं, जो नंद बाबा के यहाँ गोकुल में रहती थीं। इस प्रकार, देवकी का सातवां पुत्र बलराम, वासुदेव के बड़े भाई, कंस के हाथों मारे जाने से बच गए। कंस ने सोचा कि देवकी का गर्भ स्वतः ही गिर गया है।
भगवान कृष्ण का जन्म: दिव्य प्राकट्य
अष्टमी की आधी रात
अंततः, वह शुभ घड़ी आ ही गई, जिसका इंतजार देव-असुर, मनुष्य और समस्त सृष्टि कर रही थी। भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि थी और रोहिणी नक्षत्र का संयोग था। वातावरण में एक दिव्य शांति छाई हुई थी। आधी रात का समय था, जब घनघोर वर्षा हो रही थी और बिजली कड़क रही थी। कारागार के सभी द्वार बंद थे और पहरेदार नींद में डूबे हुए थे। ऐसे ही अंधकारपूर्ण और भयभीत माहौल में, देवकी के आठवें गर्भ से स्वयं भगवान विष्णु ने जन्म लिया।
दिव्य शिशु का प्राकट्य
देवकी और वासुदेव के समक्ष एक अद्भुत और तेजस्वी शिशु प्रकट हुआ। शिशु के चार भुजाएँ थीं, जिनमें वह शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण किए हुए था। उसके मुख पर एक दिव्य तेज था और शरीर पर पीताम्बर धारण किए हुए था। वह कोई साधारण शिशु नहीं, बल्कि साक्षात् भगवान श्री हरि का रूप था। भगवान ने अपने माता-पिता को दर्शन दिए और उनसे कहा कि वे उन्हें तुरंत गोकुल में नंद बाबा के यहाँ पहुँचा दें और वहाँ यशोदा के गर्भ से उत्पन्न हुई कन्या को अपने साथ ले आएँ।
भगवान ने आगे बताया कि यह सब उनकी माया के कारण हो रहा है। उन्होंने वासुदेव को आदेश दिया कि वे तुरंत उन्हें गोकुल ले जाएँ। इसके बाद, भगवान ने अपना चतुर्भुज रूप त्याग कर एक सामान्य शिशु का रूप धारण कर लिया।
गोकुल की ओर प्रस्थान: एक चमत्कारिक यात्रा
कारागार से मुक्ति
भगवान के आदेश के बाद, कारागार में चमत्कार होने लगे। अचानक सभी बेड़ियाँ खुल गईं, कारागार के भारी भरकम लोहे के द्वार अपने आप खुल गए और पहरेदार गहरी नींद में सो गए। वासुदेव ने नवजात कृष्ण को एक टोकरी में उठाया और गोकुल की ओर चल पड़े। बाहर मूसलाधार वर्षा हो रही थी और यमुना नदी अपने पूरे उफान पर थी।
यमुना पार करना
वासुदेव ने कृष्ण को अपने सिर पर रखी टोकरी में लेकर यमुना नदी को पार करना शुरू किया। नदी का जल स्तर लगातार बढ़ रहा था, लेकिन जैसे ही कृष्ण के चरण जल से स्पर्श हुए, यमुना नदी का जल स्वतः ही नीचे उतर गया, जिससे वासुदेव आसानी से नदी पार कर सके। रास्ते में भारी वर्षा से शिशु को बचाने के लिए शेषनाग स्वयं प्रकट हुए और अपने फन से कृष्ण के ऊपर छत्र की तरह छाया किए रहे।
यशोदा के घर शिशु का आदान-प्रदान
गोकुल पहुँचकर वासुदेव नंद बाबा के घर में प्रवेश कर गए, जहाँ सभी लोग गहरी नींद में सो रहे थे। उसी रात, यशोदा मैया ने भी एक कन्या को जन्म दिया था। वासुदेव ने चुपचाप कृष्ण को यशोदा के बगल में लिटा दिया और उस नवजात कन्या को लेकर वापस मथुरा के कारागार में आ गए। उन्होंने बच्ची को देवकी के पास लिटा दिया और पुनः बेड़ियाँ पहनकर कारागार में बंद हो गए। द्वार स्वतः ही बंद हो गए और पहरेदार जाग गए।
कंस का भ्रम और योगमाया का प्रकटीकरण
सुबह होते ही पहरेदारों ने देवकी के आठवें बच्चे के जन्म की खबर कंस को दी। कंस तुरंत कारागार में आया और बच्ची को देखकर क्रोधित हो गया कि यह तो कन्या है, मेरा वध कैसे कर सकती है? उसने बच्ची को छीनकर पत्थर पर पटकने का प्रयास किया। लेकिन जैसे ही कंस ने बच्ची को ऊपर उछाला, वह उसके हाथों से छूटकर आकाश में उड़ गई और एक दिव्य देवी के रूप में प्रकट हुई।
देवी ने कंस से कहा, "अरे मूर्ख कंस! तुझे मारने वाला तो इस पृथ्वी पर पहले ही जन्म ले चुका है। तेरा काल गोकुल में पल रहा है।" इतना कहकर वह देवी अंतर्ध्यान हो गईं। यह देवी कोई और नहीं, बल्कि स्वयं योगमाया थीं। कंस यह सुनकर और भी भयभीत हो गया और उसने तुरंत अपने राक्षसों को गोकुल और आसपास के सभी नवजात शिशुओं को मारने का आदेश दिया, लेकिन वह अपने काल को नहीं पहचान पाया।
भगवान कृष्ण की बाल लीलाएं: गोकुल में आनंद
गोकुल में कृष्ण के जन्म से नंद बाबा और यशोदा मैया की खुशी का ठिकाना न रहा। पूरे गोकुल में उत्सव का माहौल छा गया। कृष्ण ने अपने बचपन में अनेक अद्भुत लीलाएं कीं, जिन्होंने सभी गोप-गोपिकाओं और ब्रजवासियों का मन मोह लिया। उन्होंने पूतना, शकटासुर, तृणावर्त जैसे अनेक राक्षसों का वध किया। माखन चोरी की लीलाएं कीं, गोवर्धन पर्वत उठाया और अनगिनत ऐसे कार्य किए जिनसे उनकी दिव्यता प्रमाणित हुई। उनकी इन्हीं लीलाओं ने उन्हें बाल गोपाल और माखन चोर जैसे प्रिय नामों से प्रसिद्ध किया।
जन्माष्टमी क्यों मनाई जाती है? धार्मिक महत्व
जन्माष्टमी का पर्व भगवान कृष्ण के जन्म का उत्सव है, लेकिन इसका महत्व केवल एक जन्मदिन मनाने से कहीं अधिक गहरा है। इसके कई महत्वपूर्ण कारण हैं:
- धर्म की स्थापना और अधर्म का नाश: भगवान कृष्ण का जन्म अधर्मी कंस के अत्याचारों को समाप्त करने और धर्म की स्थापना के लिए हुआ था। उनका आगमन इस बात का प्रतीक है कि जब-जब पृथ्वी पर पाप बढ़ता है, भगवान स्वयं आकर भक्तों का उद्धार करते हैं और दुष्टों का संहार करते हैं।
- आशा और मुक्ति का प्रतीक: कंस के कारागार में देवकी और वासुदेव के लिए कृष्ण का जन्म आशा की किरण लेकर आया। यह पर्व हमें सिखाता है कि चाहे परिस्थितियाँ कितनी भी विकट क्यों न हों, ईश्वर पर विश्वास रखने से अंततः विजय सत्य और धर्म की ही होती है।
- ईश्वर के अवतार का उत्सव: भगवान कृष्ण स्वयं परम ब्रह्म के पूर्ण अवतार हैं। उनका जन्म पृथ्वी पर प्रेम, ज्ञान और भक्ति के संदेश को प्रसारित करने के लिए हुआ था। जन्माष्टमी इसी दिव्य अवतरण का सम्मान और उत्सव है।
- सामाजिक सौहार्द: यह पर्व लोगों को एक साथ लाता है, उन्हें प्रेम, भाईचारे और भक्ति के सूत्र में बांधता है।
जन्माष्टमी का आध्यात्मिक संदेश
जन्माष्टमी हमें कई गहरे आध्यात्मिक संदेश भी देती है:
- कर्मयोग का महत्व: भगवान कृष्ण ने भगवद् गीता में कर्मयोग का उपदेश दिया। उनका जीवन स्वयं इस बात का प्रमाण है कि हमें अपने कर्तव्यों का पालन निस्वार्थ भाव से करना चाहिए।
- भक्ति की शक्ति: देवकी और वासुदेव की अटूट भक्ति के कारण ही भगवान ने उनके पुत्र के रूप में जन्म लिया। यह पर्व भक्तों को अपनी भक्ति को और गहरा करने के लिए प्रेरित करता है।
- अहंकार का त्याग: कंस का अहंकार ही उसके विनाश का कारण बना। जन्माष्टमी हमें अहंकार छोड़कर विनम्रता अपनाने की प्रेरणा देती है।
- अंधकार पर प्रकाश की विजय: कृष्ण का जन्म घोर अंधकार (आधी रात) में हुआ, जो यह दर्शाता है कि सबसे कठिन समय में भी दिव्य प्रकाश और आशा बनी रहती है।
जन्माष्टमी पूजा विधि और अनुष्ठान
जन्माष्टमी के दिन भक्तजन पूरे श्रद्धा भाव से भगवान कृष्ण की पूजा-अर्चना करते हैं। यह पूजा विशेष रूप से आधी रात को की जाती है, जब भगवान का जन्म हुआ था।
उपवास का महत्व और विधि
जन्माष्टमी के दिन उपवास रखने का विशेष महत्व है। भक्त अपनी श्रद्धा और शारीरिक क्षमता के अनुसार निम्न प्रकार के उपवास रखते हैं:
- निर्जल व्रत: कुछ भक्त पूरे दिन अन्न और जल का त्याग कर निर्जल व्रत रखते हैं।
- फलाहारी व्रत: अधिकांश भक्त फलाहारी व्रत रखते हैं, जिसमें वे फल, दूध, कुट्टू का आटा, साबूदाना आदि का सेवन करते हैं।
व्रत का संकल्प सुबह स्नान आदि से निवृत होकर लिया जाता है। व्रत का पारण भगवान कृष्ण के जन्म के बाद, यानी आधी रात को या अगले दिन सुबह किया जाता है। पारण के लिए दूध, दही, पंचामृत या जल का उपयोग किया जाता है।
पूजा सामग्री
भगवान कृष्ण की पूजा के लिए निम्नलिखित सामग्री की आवश्यकता होती है:
- भगवान बाल गोपाल की प्रतिमा या चित्र
- एक छोटा पालना (झूला)
- गंगाजल
- पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद और गंगाजल का मिश्रण)
- ताजे फूल और मालाएँ (विशेषकर तुलसी के पत्ते, जो भगवान कृष्ण को अत्यंत प्रिय हैं)
- धूप और दीपक
- चंदन और रोली
- नारियल
- वस्त्र और आभूषण (बाल गोपाल के लिए)
- बाँसुरी और मोर पंख
- माखन-मिश्री, पंजीरी, फल और मिठाई (भोग के लिए)
- एक कलश (पानी से भरा हुआ)
- घंटी और शंख
पूजा विधि के चरण
- शुद्धिकरण: पूजा से पहले स्वयं स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा स्थल को गंगाजल छिड़क कर पवित्र करें।
- संकल्प: हाथ में जल लेकर भगवान कृष्ण का स्मरण करते हुए व्रत और पूजा का संकल्प लें।
- बाल गोपाल का अभिषेक: रात में 12 बजे के आस-पास, बाल गोपाल की प्रतिमा को एक पात्र में रखें। सबसे पहले उन्हें गंगाजल से स्नान कराएं। फिर पंचामृत से अभिषेक करें। अंत में पुनः गंगाजल से स्नान कराएं।
- श्रृंगार: स्नान के बाद बाल गोपाल को नए वस्त्र पहनाएं, आभूषण, मोर पंख और बाँसुरी से उनका श्रृंगार करें। उन्हें पालने में विराजमान करें।
- तिलक और पुष्प अर्पित करें: चंदन और रोली से तिलक लगाएं। ताजे फूल और तुलसी के पत्ते अर्पित करें।
- दीप प्रज्ज्वलन और धूप: दीपक जलाएं और सुगंधित धूप करें।
- भोग लगाएं: माखन-मिश्री, पंजीरी, फल, मिठाई और अन्य पकवानों का भोग लगाएं। भगवान को तुलसी का पत्ता अवश्य चढ़ाएं।
- आरती और भजन: घंटी बजाते हुए भगवान कृष्ण की आरती करें। जन्माष्टमी के भजन और कीर्तन करें।
- कथा श्रवण: भगवान कृष्ण के जन्म की कथा (जैसा कि ऊपर वर्णित है) का पाठ करें या सुनें।
- प्रणाम और प्रार्थना: भगवान से अपनी मनोकामनाएं पूर्ण करने और सुख-शांति प्रदान करने की प्रार्थना करें।
- पारण: आरती और पूजा के बाद, यदि आप व्रत रखे हुए हैं, तो जल, पंचामृत या फल ग्रहण करके व्रत का पारण करें।
भारत के विभिन्न हिस्सों में जन्माष्टमी का उत्सव
जन्माष्टमी का उत्सव पूरे भारत में बड़े उत्साह और भक्ति के साथ मनाया जाता है, लेकिन कुछ क्षेत्रों में इसकी अपनी अनूठी परंपराएं और तरीके हैं:
- मथुरा और वृंदावन: यह भगवान कृष्ण की जन्मभूमि और क्रीड़ाभूमि है, इसलिए यहाँ जन्माष्टमी का उत्सव अत्यंत भव्य होता है। मंदिरों को भव्य रूप से सजाया जाता है। मध्यरात्रि में भगवान का अभिषेक होता है, रासलीलाएं आयोजित की जाती हैं और झांकियां निकाली जाती हैं। दूर-दूर से श्रद्धालु यहाँ दर्शन के लिए आते हैं।
- द्वारका (गुजरात): यह भगवान कृष्ण की कर्मभूमि है। यहाँ भी मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना और जन्मोत्सव मनाया जाता है।
- महाराष्ट्र: यहाँ दही हांडी का उत्सव बहुत प्रसिद्ध है। युवा मंडली (गोविंदा पथक) मानव पिरामिड बनाकर ऊँचाई पर बंधी दही से भरी हांडी को तोड़ने का प्रयास करते हैं। यह भगवान कृष्ण की बाल लीलाओं, विशेषकर माखन चोरी, का प्रतीक है।
- दक्षिण भारत: कर्नाटक, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में घरों में 'गोलू' (गुड़ियों का प्रदर्शन) सजाया जाता है, और भगवान कृष्ण के छोटे-छोटे पैरों के निशान चावल के आटे से घर में प्रवेश करते हुए बनाए जाते हैं, जो उनके घर में आगमन का प्रतीक होते हैं।
- पूर्वी भारत (ओडिशा, पश्चिम बंगाल): यहाँ मंदिरों में विशेष पूजा, भजन-कीर्तन और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन होता है। पुरी में जगन्नाथ मंदिर में भी विशेष उत्सव मनाया जाता है।
- गुजरात: यहाँ गरबा और डांडिया रास का आयोजन होता है, जिसमें भक्त भगवान कृष्ण के सम्मान में नृत्य करते हैं।
निष्कर्ष
जन्माष्टमी का पर्व केवल भगवान कृष्ण के जन्म का उत्सव नहीं, बल्कि सत्य, धर्म और प्रेम की विजय का प्रतीक है। यह हमें सिखाता है कि चाहे कितने भी कठिन समय क्यों न आएं, ईश्वर पर अटूट विश्वास और धर्म के मार्ग पर चलने से अंततः बुराई का नाश होता है और अच्छाई की जीत होती है। यह पर्व हमें अपने जीवन में कृष्ण के आदर्शों को अपनाने, निष्काम कर्म करने और प्रेम व भक्ति से जीवन जीने की प्रेरणा देता है।
आइये, इस पावन अवसर पर हम सभी भगवान श्री कृष्ण के चरणों में नमन करें और उनके दिए गए संदेशों को अपने जीवन में उतारें। जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएँ!
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
Q: जन्माष्टमी का पर्व क्यों मनाया जाता है?
जन्माष्टमी का पर्व भगवान विष्णु के आठवें अवतार, मर्यादा पुरुषोत्तम श्री कृष्ण के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है।
Q: जन्माष्टमी किस तिथि को मनाई जाती है?
जन्माष्टमी का पर्व हर साल भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है।
Q: मथुरा नगरी पर कौन सा क्रूर शासक राज करता था?
मथुरा नगरी पर उग्रसेन का पुत्र कंस नामक एक अत्यंत क्रूर और अत्याचारी राजा राज करता था।
Q: कंस ने अपने पिता के साथ क्या किया था?
कंस ने अपने पिता को कारागार में डालकर सिंहासन हथिया लिया था।
Q: देवकी कौन थीं और उनका विवाह किससे हुआ था?
देवकी कंस की बहन थीं और उनका विवाह यादव वंश के एक वीर और धर्मपरायण पुरुष वासुदेव से हुआ था।
Q: देवकी और वासुदेव के विवाह के समय क्या आकाशवाणी हुई थी?
देवकी और वासुदेव के विवाह के समय आकाशवाणी हुई थी कि 'हे कंस! जिस बहन को तू इतने प्रेम से विदा कर रहा है, उसी के आठवें गर्भ से उत्पन्न संतान तेरा वध करेगी।'
Q: आकाशवाणी सुनकर कंस ने क्या करने का निर्णय लिया था?
आकाशवाणी सुनकर कंस क्रोधित हो गया और उसने तुरंत देवकी का वध करने का निर्णय लिया था।
Q: वासुदेव ने कंस को देवकी को मारने से रोकने के लिए क्या वचन दिया था?
वासुदेव ने कंस को यह वचन दिया था कि देवकी के गर्भ से जो भी संतान उत्पन्न होगी, उसे वे तुरंत कंस को सौंप देंगे।
Q: कंस ने वासुदेव के प्रस्ताव पर सहमत होने के बाद क्या किया?
कंस वासुदेव के प्रस्ताव पर सहमत हो गया, लेकिन उसने देवकी और वासुदेव दोनों को कारागार में डाल दिया और उन पर कड़ी पहरा बिठा दिया।
Q: देवकी ने कारागार में कितनी संतानों को जन्म दिया था?
देवकी ने कारागार में एक-एक करके सात संतानों को जन्म दिया था।
Q: कंस ने देवकी की पहली सात संतानों के साथ क्या किया?
कंस ने देवकी की पहली सात संतानों को बिना किसी दया के वध कर दिया।
Q: देवकी का सातवां गर्भ कैसे सुरक्षित रहा?
भगवान विष्णु की योगमाया के प्रभाव से देवकी का सातवां गर्भ रोहिणी के गर्भ में स्थानांतरित हो गया, जिससे वह कंस के हाथों मारे जाने से बच गए।
Q: रोहिणी कौन थीं?
रोहिणी वासुदेव की दूसरी पत्नी थीं, जो नंद बाबा के यहाँ गोकुल में रहती थीं।
Q: देवकी का सातवां पुत्र कौन था?
देवकी का सातवां पुत्र बलराम थे।
Q: भगवान कृष्ण का जन्म किस समय हुआ था?
भगवान कृष्ण का जन्म भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि की आधी रात को हुआ था।
प्रार्थना संपादकीय टीम
प्रार्थना संपादकीय टीम आपकी आध्यात्मिक यात्रा का समर्थन करने के लिए दैनिक आध्यात्मिक मार्गदर्शन, प्रामाणिक अनुष्ठान और प्राचीन सनातन शास्त्रों से गहरे अंतर्दृष्टि साझा करती है।
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