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ऋषि पंचमी 2026: जानिए तिथि, शुभ मुहूर्त और संपूर्ण पूजा विधि

ऋषि पंचमी 2026: जानिए तिथि, शुभ मुहूर्त और संपूर्ण पूजा विधि
ऋषि पंचमी 2026: जानिए तिथि, शुभ मुहूर्त और संपूर्ण पूजा विधि

ऋषि पंचमी 2026: जानिए तिथि, शुभ मुहूर्त और संपूर्ण पूजा विधि

हिंदू धर्म में अनेक व्रत और त्योहार मनाए जाते हैं, जिनमें से प्रत्येक का अपना विशिष्ट महत्व है। इन्हीं में से एक है ऋषि पंचमी का पावन पर्व। यह दिन सप्त ऋषियों को समर्पित है और विशेष रूप से महिलाओं द्वारा रखा जाता है ताकि वे जाने-अनजाने में हुई गलतियों और रजस्वला संबंधी दोषों से मुक्ति पा सकें। यह व्रत आत्म-शुद्धि, ज्ञान और ऋषियों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। 2026 में ऋषि पंचमी कब है, इसका शुभ मुहूर्त क्या है, और इस व्रत को विधि-विधान से कैसे संपन्न किया जाए, इन सभी विषयों पर विस्तृत जानकारी आपको इस लेख में मिलेगी।

ऋषि पंचमी क्या है?

ऋषि पंचमी भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाई जाती है। यह त्योहार गणेश चतुर्थी के अगले दिन आता है और हरितालिका तीज के ठीक बाद आता है। यह व्रत मुख्यतः सप्त ऋषियों (कश्यप, अत्रि, भारद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और वशिष्ठ) के प्रति श्रद्धा और सम्मान व्यक्त करने के लिए रखा जाता है। इस दिन भक्त उन महान ऋषियों को नमन करते हैं जिन्होंने अपना जीवन समाज के कल्याण और ज्ञान के प्रचार-प्रसार में समर्पित कर दिया। यह व्रत विशेष रूप से उन महिलाओं के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है, जिनसे मासिक धर्म (रजस्वला) के दौरान अनजाने में हुई अशुद्धियों या नियमों के उल्लंघन का प्रायश्चित करने में मदद मिलती है।

ऐतिहासिक एवं धार्मिक महत्व

ऋषि पंचमी का उल्लेख प्राचीन धर्मग्रंथों और पुराणों में मिलता है। इसका संबंध उस समय से है जब समाज में शुद्धता और पवित्रता के नियमों का अत्यधिक महत्व था। मासिक धर्म के दौरान महिलाओं के लिए कुछ विशेष नियम बनाए गए थे, और यह माना जाता था कि यदि इन नियमों का उल्लंघन होता है, तो इससे दोष लगता है। ऋषि पंचमी का व्रत इसी दोष से मुक्ति पाने का एक विधान है। यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्म-चिंतन और आत्म-शुद्धि का प्रतीक भी है। यह हमें ऋषियों द्वारा प्रदान किए गए ज्ञान, तपस्या और त्याग की याद दिलाता है और हमें उनके बताए मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करता है।

ऋषि पंचमी 2026: तिथि और शुभ मुहूर्त

वर्ष 2026 में, ऋषि पंचमी का पावन पर्व निम्नलिखित तिथि और शुभ मुहूर्त में मनाया जाएगा:

ऋषि पंचमी तिथि 2026

  • तिथि: भाद्रपद शुक्ल पंचमी
  • ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार दिनांक: शनिवार, 29 अगस्त, 2026
  • पंचमी तिथि का प्रारंभ: 28 अगस्त, 2026 को शाम 06:15 बजे से
  • पंचमी तिथि का समापन: 29 अगस्त, 2026 को रात 08:30 बजे तक

शुभ मुहूर्त

ऋषि पंचमी की पूजा मध्याह्न काल में करना विशेष फलदायी माना जाता है। 29 अगस्त 2026 को पूजा के लिए शुभ मुहूर्त इस प्रकार रहेगा:

  • पूजा का शुभ मुहूर्त: 29 अगस्त, 2026 को सुबह 11:00 बजे से दोपहर 01:30 बजे तक (लगभग 2 घंटे 30 मिनट की अवधि)

हालांकि, आप अपनी स्थानीय पंचांग और पुरोहितों से सलाह लेकर सटीक मुहूर्त की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। यह सुनिश्चित करेगा कि आप सही समय पर पूजा करें और व्रत का पूरा लाभ प्राप्त करें।

पंच ऋषि और उनका योगदान

ऋषि पंचमी का व्रत उन महान संतों और ऋषियों के प्रति सम्मान व्यक्त करने का दिन है जिन्होंने मानव जाति के उत्थान के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया। वेदों और पुराणों में अनेक ऋषियों का उल्लेख मिलता है, जिनमें सप्त ऋषि प्रमुख हैं। हालांकि, "पंच ऋषियों" का संदर्भ भी मिलता है जो ब्रह्मांड की संरचना और ज्ञान के विभिन्न पहलुओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यह व्रत सभी ऋषियों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का एक व्यापक माध्यम है, जिन्होंने हमें धर्म, कर्म, ज्ञान, विज्ञान और जीवन जीने की कला सिखाई।

ऋषियों का योगदान केवल धार्मिक उपदेशों तक सीमित नहीं था, बल्कि उन्होंने खगोल विज्ञान, चिकित्सा, गणित, दर्शन और सामाजिक व्यवस्था जैसे क्षेत्रों में भी गहन शोध और सिद्धांत प्रस्तुत किए। उन्होंने तपस्या और ध्यान के माध्यम से गहन ज्ञान प्राप्त किया और उसे मानवता के साथ साझा किया। उनके योगदान में शामिल हैं:

  • वेदों और उपनिषदों की रचना: ऋषियों ने वेदों (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद) और उपनिषदों के ज्ञान को प्रकट किया, जो आज भी भारतीय संस्कृति और दर्शन का आधार है।
  • आध्यात्मिक मार्गदर्शन: उन्होंने मोक्ष के मार्ग पर चलने के लिए नैतिक और आध्यात्मिक सिद्धांत स्थापित किए।
  • सामाजिक नियम और व्यवस्था: ऋषियों ने धर्मशास्त्रों और स्मृतियों के माध्यम से समाज के संचालन के लिए नियम और कानून बनाए, जो एक सुव्यवस्थित समाज की नींव थे।
  • ज्ञान-विज्ञान का प्रचार: गुरुकुल परंपरा के माध्यम से उन्होंने ज्ञान को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचाया, जिससे अनेक शास्त्रों और कलाओं का विकास हुआ।
  • प्रकृति और पर्यावरण का संरक्षण: उन्होंने प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित करने और उसके संरक्षण का महत्व सिखाया।

ऋषि पंचमी पर हम उन सभी ऋषियों को याद करते हैं जिन्होंने हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने का मार्ग दिखाया। यह व्रत हमें उनके त्याग, तपस्या और ज्ञान के प्रति श्रद्धावान बनाता है।

ऋषि पंचमी का महत्व

ऋषि पंचमी का व्रत धार्मिक और आध्यात्मिक दोनों दृष्टियों से अत्यधिक महत्वपूर्ण है। इसके मुख्य महत्व इस प्रकार हैं:

  • रजस्वला दोष से मुक्ति: यह व्रत विशेष रूप से महिलाओं द्वारा मासिक धर्म (रजस्वला) के दौरान जाने-अनजाने में हुई अशुद्धियों या नियमों के उल्लंघन के दोषों से मुक्ति पाने के लिए किया जाता है। प्राचीन काल में मासिक धर्म के दौरान कुछ कठोर नियम थे, जिनका पालन न करने पर दोष लगता था। यह व्रत उन दोषों के प्रायश्चित का माध्यम है।
  • आत्म-शुद्धि और पवित्रता: यह व्रत शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक पवित्रता प्राप्त करने में सहायक होता है। भक्त इस दिन अपनी अंतरात्मा को शुद्ध करने और सात्विक जीवन जीने का संकल्प लेते हैं।
  • ऋषियों का आशीर्वाद: इस दिन ऋषियों की पूजा करने से उनकी कृपा और आशीर्वाद प्राप्त होता है, जिससे ज्ञान, बुद्धि और समृद्धि में वृद्धि होती है।
  • पापों का निवारण: माना जाता है कि ऋषि पंचमी का व्रत श्रद्धापूर्वक करने से समस्त पापों का निवारण होता है और व्यक्ति को पुण्य की प्राप्ति होती है।
  • सुख-समृद्धि की प्राप्ति: यह व्रत परिवार में सुख, शांति और समृद्धि लाने वाला माना जाता है।

यह व्रत क्यों रखा जाता है?

ऋषि पंचमी का व्रत मुख्य रूप से महिलाओं द्वारा रखा जाता है। इसकी कथा के अनुसार, प्राचीन काल में मासिक धर्म के दौरान महिलाओं के लिए रसोई और धार्मिक कार्यों से दूर रहने जैसे कुछ नियम बनाए गए थे। यदि किसी कारणवश इन नियमों का उल्लंघन हो जाता था, तो उसे रजस्वला दोष माना जाता था। यह दोष पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित हो सकता था। ऋषि पंचमी का व्रत इसी दोष के निवारण और आत्म-शुद्धि के लिए रखा जाता है। इस व्रत को करने से महिलाएं न केवल वर्तमान के दोषों से मुक्ति पाती हैं, बल्कि पूर्व जन्मों के अनजाने पापों का भी प्रायश्चित करती हैं, जिससे उन्हें मानसिक शांति और आध्यात्मिक संतोष मिलता है।

ऋषि पंचमी व्रत के नियम

ऋषि पंचमी का व्रत अत्यंत पवित्रता और नियमों के साथ किया जाता है। इन नियमों का पालन करने से ही व्रत का पूर्ण फल प्राप्त होता है:

  • अन्न त्याग: इस व्रत में अनाज का सेवन पूर्णतः वर्जित होता है। भक्त केवल फल, कंद-मूल (जड़ें), दूध और दही का सेवन कर सकते हैं। विशेष रूप से उन खाद्य पदार्थों से बचना चाहिए जो हल्दी (हल से जुती हुई भूमि) में उगाए जाते हैं।
  • हल से जुते अनाज का त्याग: ऋषि पंचमी पर 'हल से जुते' हुए किसी भी अनाज का सेवन नहीं किया जाता है। इसके स्थान पर, विशेष रूप से समा के चावल (Barnyard millet) या मोरधन का सेवन किया जा सकता है, क्योंकि इन्हें हल से जुती भूमि में नहीं उगाया जाता है।
  • एक बार भोजन: व्रती को केवल एक बार फलाहार या सात्विक भोजन (बिना नमक या मसालों वाला) करना चाहिए।
  • ब्रह्मचर्य का पालन: व्रत के दौरान शारीरिक और मानसिक शुद्धता बनाए रखने के लिए ब्रह्मचर्य का पालन करना अनिवार्य है।
  • सत्य बोलना: इस दिन सत्य बोलने, किसी की निंदा न करने और मन में किसी के प्रति द्वेष न रखने का संकल्प लेना चाहिए।
  • पवित्रता: व्रत के पूरे दिन पवित्रता बनाए रखनी चाहिए। स्नान आदि के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करने चाहिए।
  • पूजा और ध्यान: दिन भर ऋषियों का स्मरण, मंत्र जाप, पूजा-पाठ और ध्यान करना चाहिए।

क्या खाएं और क्या नहीं खाएं

  • खाएं: फल, दूध, दही, मखाने, सिंघाड़े का आटा, कुट्टू का आटा, समा के चावल, शकरकंद, अरबी, पानीफल।
  • नहीं खाएं: गेहूं, चावल, दालें, मसालेदार सब्जियां, नमक (कुछ लोग सेंधा नमक का उपयोग करते हैं, लेकिन पूर्ण शुद्धता के लिए इसे भी त्यागना चाहिए)। हल्दी से जुते हुए सभी प्रकार के अनाज और सब्जियां वर्जित हैं।

पूजा सामग्री

ऋषि पंचमी की पूजा के लिए निम्नलिखित सामग्री की आवश्यकता होती है:

  • शुद्धिकरण के लिए:
    • गाय का गोबर (गोमय)
    • मिट्टी (मृत्तिका)
    • भस्म (राख)
    • तिल (तिल)
    • दूब घास (दूर्वा)
    • आंवला
    • सरसों (कुछ लोग उपयोग करते हैं)
  • पूजा के लिए:
    • सप्त ऋषियों या ऋषि स्वरूप की प्रतिमा या चित्र
    • कलश (जल से भरा हुआ)
    • दीपक और घी/तेल
    • धूप और अगरबत्ती
    • पुष्प (सफेद या पीले फूल शुभ माने जाते हैं)
    • माला
    • रोली, चंदन, हल्दी
    • अक्षत (साबुत चावल)
    • मौली (कलावा)
    • यज्ञोपवीत (जनेऊ)
    • पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, गंगाजल का मिश्रण)
    • गंगाजल या शुद्ध जल
    • वस्त्र (ऋषियों को अर्पित करने हेतु सफेद या पीले वस्त्र)
    • दक्षिणा
  • भोग (प्रसाद) के लिए:
    • फल (केला, सेब आदि)
    • मिठाई (दूध से बनी, जैसे पेड़ा, बर्फी)
    • सूखे मेवे
    • समा के चावल की खीर या कोई अन्य सात्विक फलाहार

संपूर्ण पूजा विधि

ऋषि पंचमी का व्रत विधि-विधान से करना अत्यंत महत्वपूर्ण है। पूजा विधि इस प्रकार है:

सुबह की तैयारी

  1. प्रातः स्नान: सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर घर की साफ-सफाई करें। इसके बाद, पवित्र नदी या कुंड में स्नान करें। यदि यह संभव न हो, तो घर पर ही गंगाजल मिले पानी से स्नान करें। स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
  2. दंत धावन और शुद्धिकरण: इस दिन स्नान से पहले दंत धावन (दांत साफ करना) के लिए केवल दतवन का प्रयोग करें। शरीर की शुद्धता के लिए गोबर, मिट्टी, भस्म, दूब, तिल, आंवले और सरसों का लेप लगाकर स्नान करने का विधान है, जिसे 'सप्त मृत्तिका स्नान' कहा जाता है। यह स्नान शरीर और आत्मा दोनों को शुद्ध करता है।
  3. संकल्प: स्नान के बाद, पूजा स्थान पर बैठकर हाथ में जल, फूल और अक्षत लेकर ऋषि पंचमी व्रत का संकल्प लें। कहें, "मैं अमुक गोत्र की अमुक नाम की स्त्री (पुरुष) अपने समस्त ज्ञात-अज्ञात पापों, विशेषतः रजस्वला दोष से मुक्ति के लिए ऋषि पंचमी का यह व्रत रखती हूं/रखता हूं।"

पूजा विधि

  1. अर्घ्य स्थापना: पूजा स्थान पर एक स्वच्छ चौकी या पटिया पर सफेद वस्त्र बिछाएं। उस पर सप्त ऋषियों की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। यदि प्रतिमा न हो तो सात सुपारी रखकर उन्हें ऋषियों का प्रतीक माना जा सकता है।
  2. कलश स्थापना: सप्त ऋषियों के सामने एक जल से भरा कलश स्थापित करें। कलश पर स्वास्तिक बनाकर मौली बांधें और उसमें आम के पत्ते तथा नारियल रखें।
  3. ऋषियों का आवाहन: हाथ में फूल लेकर ऋषियों का ध्यान करें और उनका आवाहन करें। "ॐ सप्तऋषिभ्यो नमः" मंत्र का जाप करें।
  4. षोडशोपचार पूजा:
    • अर्घ्य: ऋषियों को जल अर्पित करें।
    • आचमन: आचमन के लिए जल दें।
    • स्नान: पंचामृत और फिर शुद्ध जल से प्रतीकात्मक स्नान कराएं।
    • वस्त्र: ऋषियों को सफेद या पीले वस्त्र (या मौली) अर्पित करें।
    • यज्ञोपवीत: जनेऊ चढ़ाएं।
    • गंध: चंदन, रोली, हल्दी का तिलक लगाएं।
    • पुष्प: फूल और माला अर्पित करें।
    • धूप-दीप: धूप जलाएं और घी का दीपक प्रज्ज्वलित करें।
    • नैवेद्य: फल, मिठाई, सूखे मेवे और समा के चावल की खीर का भोग लगाएं। ध्यान रहे, नैवेद्य में हल से जुते अनाज का प्रयोग न हो।
    • तांबूल: पान का पत्ता अर्पित करें।
    • दक्षिणा: सामर्थ्य अनुसार दक्षिणा अर्पित करें।
  5. आरती: ऋषियों की आरती उतारें।
  6. मंत्र जाप: "ॐ कश्यपाय नमः, ॐ अत्रये नमः, ॐ भारद्वाजाय नमः, ॐ विश्वामित्राय नमः, ॐ गौतमाय नमः, ॐ जमदग्नये नमः, ॐ वशिष्ठाय नमः" या "ॐ श्री ऋषिभ्यो नमः" मंत्र का 108 बार जाप करें।
  7. व्रत कथा श्रवण: ऋषि पंचमी की व्रत कथा सुनें या पढ़ें।
  8. क्षमा प्रार्थना: पूजा में हुई किसी भी त्रुटि के लिए ऋषियों से क्षमा याचना करें।
  9. प्रसाद वितरण: पूजा संपन्न होने के बाद प्रसाद सभी में वितरित करें।

पारण (व्रत तोड़ना)

ऋषि पंचमी का व्रत अगले दिन (षष्ठी तिथि) सूर्योदय के बाद पारण करके तोड़ा जाता है। पारण के समय हल से जुते अनाज का सेवन किया जा सकता है।

ऋषि पंचमी व्रत कथा

ऋषि पंचमी व्रत की पौराणिक कथा इस प्रकार है:

प्राचीन काल में एक उत्तक नाम का ब्राह्मण था, जिसकी पत्नी का नाम सुशीला था। वे अत्यंत धर्मात्मा थे और उनके दो पुत्र और एक पुत्री थी। समय के साथ, उन्होंने अपनी पुत्री का विवाह एक अच्छे कुल के युवक से कर दिया। कुछ समय बाद, उत्तक और सुशीला वृद्ध हो गए और उनके पुत्र विवाह के बाद अपने परिवार के साथ रहने लगे।

एक बार, ब्राह्मण की पुत्री अपने मायके आई हुई थी। जब वह रात को सो रही थी, तो उसके शरीर पर कीड़े पड़ गए। यह देखकर उसकी माँ सुशीला बहुत चिंतित हुई और उसने अपने पति उत्तक से इस रहस्य का कारण पूछा। उत्तक ने अपनी तपस्या के बल से इसका कारण जाना।

उन्होंने बताया कि "हे सुशीला! हमारी पुत्री ने पूर्व जन्म में एक ब्राह्मणी का जन्म लिया था। वह मासिक धर्म (रजस्वला) के दौरान उचित नियमों का पालन नहीं करती थी। उसने मासिक धर्म के समय भी रसोई के बर्तन छू लिए थे और अनजाने में कई अन्य नियमों का उल्लंघन किया था। उसी पाप के कारण उसे इस जन्म में यह कष्ट भोगना पड़ रहा है।"

उत्तक ब्राह्मण ने आगे बताया कि "शास्त्रों के अनुसार, रजस्वला स्त्री को चार दिन तक किसी को छूना नहीं चाहिए, न ही वह कोई गृहकार्य कर सकती है। यदि वह ऐसा करती है, तो वह पाप की भागी बनती है। हमारी पुत्री ने इन नियमों का उल्लंघन किया, और इसी कारण वह इस पीड़ा से गुजर रही है। इस पाप से मुक्ति पाने का एकमात्र उपाय ऋषि पंचमी का व्रत है।"

उत्तक ब्राह्मण ने अपनी पुत्री को ऋषि पंचमी व्रत की विधि विस्तार से बताई। पुत्री ने श्रद्धापूर्वक अपने माता-पिता के बताए अनुसार ऋषि पंचमी का व्रत रखा। उसने विधि-विधान से सप्त ऋषियों की पूजा की, पवित्र नदियों में स्नान किया और समस्त नियमों का पालन किया। व्रत के प्रभाव से उसके शरीर से कीड़े समाप्त हो गए और वह रोगमुक्त हो गई। उसे अपने पापों से मुक्ति मिली और वह स्वस्थ एवं सुखी जीवन जीने लगी।

तभी से ऋषि पंचमी का व्रत महिलाओं के लिए रजस्वला दोष और अन्य अनजाने पापों के प्रायश्चित के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाने लगा। यह कथा हमें शुद्धता, नियमों के पालन और ऋषियों के प्रति श्रद्धा के महत्व को सिखाती है।

ऋषि पंचमी व्रत के लाभ

ऋषि पंचमी का व्रत केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि इसके कई आध्यात्मिक, मानसिक और शारीरिक लाभ भी हैं:

  • पापों से मुक्ति: यह व्रत रजस्वला दोष और अन्य ज्ञात-अज्ञात पापों से मुक्ति दिलाने में सहायक माना जाता है, जिससे व्यक्ति को आत्मिक शांति मिलती है।
  • शारीरिक और मानसिक शुद्धता: सप्त मृत्तिका स्नान और व्रत के नियमों का पालन करने से शरीर और मन दोनों की शुद्धि होती है। यह नकारात्मक विचारों को दूर कर सकारात्मकता लाता है।
  • ज्ञान और बुद्धि की प्राप्ति: ऋषियों की पूजा करने से उनकी कृपा प्राप्त होती है, जिससे ज्ञान, बुद्धि और विवेक में वृद्धि होती है। यह विद्याथियों और ज्ञान प्राप्त करने वालों के लिए विशेष लाभकारी है।
  • आध्यात्मिक उन्नति: व्रत और पूजा के माध्यम से व्यक्ति आध्यात्मिकता की ओर अग्रसर होता है, जिससे आत्मिक विकास और परमात्मा से जुड़ाव महसूस होता है।
  • पारिवारिक सुख-समृद्धि: यह व्रत परिवार में सुख, शांति और समृद्धि लाता है। व्रत करने वाले को स्वस्थ संतान और एक सुखी वैवाहिक जीवन का आशीर्वाद मिलता है।
  • संकल्प शक्ति में वृद्धि: व्रत के कठोर नियमों का पालन करने से व्यक्ति की संकल्प शक्ति और आत्म-नियंत्रण में वृद्धि होती है।
  • रोगों से मुक्ति: पौराणिक कथा के अनुसार, इस व्रत के प्रभाव से शारीरिक कष्टों और रोगों से भी मुक्ति मिलती है।
  • ऋषि ऋण से मुक्ति: इस व्रत को करके हम उन महान ऋषियों के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करते हैं जिन्होंने हमें ज्ञान और जीवन का मार्ग दिखाया। यह हमें उनके 'ऋषि ऋण' से मुक्ति दिलाने में मदद करता है।

निष्कर्ष

ऋषि पंचमी का पर्व आत्म-शुद्धि, ज्ञान और ऋषियों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का एक अनूठा अवसर है। 2026 में 29 अगस्त को पड़ने वाला यह व्रत हमें अपने नैतिक और आध्यात्मिक मूल्यों को पुनः स्थापित करने का मौका देगा। विधि-विधान से इस व्रत को करने से न केवल रजस्वला दोष जैसे विशिष्ट पापों से मुक्ति मिलती है, बल्कि यह हमें मानसिक शांति, आध्यात्मिक ज्ञान और ऋषियों के अनमोल आशीर्वाद से भी परिपूर्ण करता है। आइए, इस पावन दिन पर हम सभी श्रद्धा और भक्ति के साथ ऋषियों का स्मरण करें और उनके द्वारा दिखाए गए ज्ञान के मार्ग पर चलने का संकल्प लें, ताकि हमारा जीवन पवित्रता और सद्गुणों से आलोकित हो सके।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

Q: ऋषि पंचमी क्या है?

ऋषि पंचमी भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाई जाती है। यह सप्त ऋषियों को समर्पित एक पावन पर्व है, जो गणेश चतुर्थी के अगले दिन आता है।

Q: वर्ष 2026 में ऋषि पंचमी कब है?

वर्ष 2026 में, ऋषि पंचमी शनिवार, 29 अगस्त, 2026 को मनाई जाएगी।

Q: ऋषि पंचमी 2026 का शुभ मुहूर्त क्या है?

29 अगस्त, 2026 को पूजा का शुभ मुहूर्त सुबह 11:00 बजे से दोपहर 01:30 बजे तक (लगभग 2 घंटे 30 मिनट की अवधि) रहेगा।

Q: ऋषि पंचमी का व्रत कौन रखता है और क्यों?

यह व्रत विशेष रूप से महिलाओं द्वारा रखा जाता है ताकि वे जाने-अनजाने में हुई गलतियों और रजस्वला संबंधी दोषों से मुक्ति पा सकें। यह आत्म-शुद्धि और ऋषियों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का माध्यम है।

Q: ऋषि पंचमी पर किन ऋषियों की पूजा की जाती है?

इस दिन मुख्यतः सप्त ऋषियों - कश्यप, अत्रि, भारद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और वशिष्ठ - के प्रति श्रद्धा और सम्मान व्यक्त किया जाता है।

Q: ऋषि पंचमी का ऐतिहासिक एवं धार्मिक महत्व क्या है?

ऋषि पंचमी का उल्लेख प्राचीन धर्मग्रंथों में मिलता है और यह शुद्धता व पवित्रता के नियमों से संबंधित है। यह मासिक धर्म के दौरान हुई अशुद्धियों के प्रायश्चित और ऋषियों के ज्ञान, तपस्या और त्याग की याद दिलाता है।

Q: पंचमी तिथि का प्रारंभ और समापन 2026 में कब होगा?

पंचमी तिथि का प्रारंभ 28 अगस्त, 2026 को शाम 06:15 बजे से होगा और समापन 29 अगस्त, 2026 को रात 08:30 बजे तक होगा।

Q: ऋषि पंचमी किस अन्य त्योहार के बाद आती है?

ऋषि पंचमी गणेश चतुर्थी के अगले दिन और हरितालिका तीज के ठीक बाद आती है।

Q: ऋषि पंचमी की पूजा किस काल में करना विशेष फलदायी माना जाता है?

ऋषि पंचमी की पूजा मध्याह्न काल में करना विशेष फलदायी माना जाता है।

Q: ऋषि पंचमी का व्रत रखने का मुख्य उद्देश्य क्या है?

इस व्रत का मुख्य उद्देश्य आत्म-शुद्धि, ज्ञान की प्राप्ति, ऋषियों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना और मासिक धर्म संबंधी अनजाने दोषों से मुक्ति पाना है।

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