सौभाग्य के लिए तीज का व्रत: जानिए नियम, सामग्री और पूजा की सही विधि
- द्वारा प्रार्थना संपादकीय टीम
- प्रकाशित: July 21, 2026
- अंतिम अपडेट: July 21, 2026
- 10 Mins

सौभाग्य के लिए तीज का व्रत: जानिए नियम, सामग्री और पूजा की सही विधि
भारतीय संस्कृति में पर्व और त्योहारों का विशेष महत्व है, और इन्हीं में से एक है तीज का व्रत। यह व्रत मुख्य रूप से सुहागिन महिलाओं द्वारा अपने पति की लंबी आयु, उत्तम स्वास्थ्य और सौभाग्य की कामना के लिए रखा जाता है। कुंवारी कन्याएं भी अच्छे वर की प्राप्ति के लिए इस व्रत को रखती हैं। यह व्रत भगवान शिव और माता पार्वती के अटूट प्रेम और मिलन का प्रतीक है। इस ब्लॉग पोस्ट में हम तीज व्रत के महत्व, उसके विभिन्न रूपों, नियमों, आवश्यक सामग्री और पूजा की विस्तृत विधि पर गहराई से चर्चा करेंगे, ताकि हर श्रद्धालु इस पवित्र व्रत को विधि-विधान से संपन्न कर सके।
तीज व्रत का ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व
तीज का व्रत, भगवान शिव और माता पार्वती के दिव्य प्रेम की अमर गाथा से जुड़ा हुआ है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की थी। उन्होंने अन्न-जल त्याग कर हिमालय पर कई वर्षों तक निर्जला व्रत रखा। उनके इस कठिन तप से भगवान शिव प्रसन्न हुए और उन्होंने माता पार्वती को अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया। कहा जाता है कि भगवान शिव और माता पार्वती का पुनर्मिलन भाद्रपद शुक्ल तृतीया के दिन हुआ था, जिसे हरतालिका तीज के नाम से जाना जाता है। इस दिन माता पार्वती ने शिवजी को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए अपनी सहेलियों के साथ एक हरण करके तपस्या की थी, इसीलिए इसे 'हरतालिका' कहा जाता है।
यह कथा सुहागिन महिलाओं को अपने पति के प्रति अगाध प्रेम और निष्ठा रखने की प्रेरणा देती है। इसी श्रद्धा के साथ महिलाएं माता पार्वती की तरह ही अखंड सौभाग्य की कामना से यह व्रत रखती हैं। तीज पर्व केवल एक व्रत नहीं, बल्कि समर्पण, त्याग और प्रेम का प्रतीक है, जो भारतीय नारी की शक्ति और आस्था को दर्शाता है।
तीज के विभिन्न रूप: एक ही श्रद्धा के अनेक रंग
भारत के विभिन्न क्षेत्रों में और विभिन्न समय पर तीज का व्रत अलग-अलग नामों और परंपराओं के साथ मनाया जाता है। ये सभी रूप माता पार्वती के प्रति श्रद्धा और सौभाग्य की कामना से जुड़े हैं, लेकिन इनके मनाने के तरीके और तिथियां थोड़ी भिन्न होती हैं। मुख्य रूप से तीन प्रकार की तीज मनाई जाती हैं:
1. हरियाली तीज (Hariyali Teej)
- कब मनाई जाती है: हरियाली तीज श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाई जाती है। यह आमतौर पर जुलाई या अगस्त के महीने में आती है।
- महत्व: यह तीज प्रकृति की हरियाली और नवजीवन का प्रतीक है। इस समय प्रकृति अपने पूरे शबाब पर होती है, चारों ओर हरियाली छाई रहती है। यह व्रत भगवान शिव और माता पार्वती के मिलन की खुशी में मनाया जाता है।
- परंपराएं: इस दिन महिलाएं हरे वस्त्र पहनती हैं, हरी चूड़ियां पहनती हैं और हाथों में मेहंदी रचाती हैं। नवविवाहिताएं अपने मायके जाती हैं और झूला झूलने, लोकगीत गाने की परंपरा है। महिलाएं भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा कर अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद मांगती हैं।
2. कजरी तीज (Kajari Teej)
- कब मनाई जाती है: कजरी तीज भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि को आती है। यह आमतौर पर अगस्त या सितंबर के महीने में पड़ती है।
- महत्व: इसे 'बड़ी तीज' भी कहा जाता है और यह हरियाली तीज से अधिक महत्वपूर्ण मानी जाती है। यह व्रत पति की लंबी उम्र, संतान सुख और घर में सुख-शांति के लिए रखा जाता है। इस दिन गायों की पूजा का भी विशेष महत्व है।
- परंपराएं: इस दिन महिलाएं निर्जला व्रत रखती हैं और शाम को चंद्रमा के दर्शन और पूजा के बाद ही व्रत का पारण करती हैं। नीमड़ी माता की पूजा की जाती है और उन्हें सिंदूर, मेहंदी, चूड़ियां अर्पित की जाती हैं। व्रत में सत्तू का विशेष महत्व होता है। महिलाएं कजरी गीत गाती हैं।
3. हरतालिका तीज (Hartalika Teej)
- कब मनाई जाती है: हरतालिका तीज भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाई जाती है। यह गणेश चतुर्थी से ठीक एक दिन पहले आती है।
- महत्व: यह तीज सभी तीज व्रतों में सबसे कठिन और महत्वपूर्ण मानी जाती है। यह माता पार्वती की कठोर तपस्या और भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने की दृढ़ इच्छाशक्ति का प्रतीक है। सुहागिनें अखंड सौभाग्य और कुंवारी कन्याएं मनचाहे वर की प्राप्ति के लिए इस व्रत को रखती हैं।
- परंपराएं: हरतालिका तीज का व्रत निर्जला और निराहार रहकर रखा जाता है, अर्थात व्रत रखने वाली महिलाएं पूरे दिन और पूरी रात पानी की एक बूंद भी ग्रहण नहीं करतीं। इस दिन भगवान शिव, माता पार्वती और गणेश जी की बालू से बनी प्रतिमाओं की पूजा की जाती है और रात भर जागरण कर भजन-कीर्तन किया जाता है। अगले दिन सुबह पूजा समाप्त होने के बाद ही व्रत का पारण किया जाता है।
तीज व्रत के धार्मिक लाभ और महत्व
तीज का व्रत केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि यह महिलाओं के जीवन में कई प्रकार के आध्यात्मिक और व्यावहारिक लाभ लेकर आता है:
- अखंड सौभाग्य की प्राप्ति: सुहागिन महिलाओं के लिए यह व्रत विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। ऐसी मान्यता है कि इस व्रत के प्रभाव से पति की आयु लंबी होती है और वैवाहिक जीवन में सुख-समृद्धि बनी रहती है। माता पार्वती के आशीर्वाद से दांपत्य जीवन में प्रेम और सामंजस्य बढ़ता है।
- मनचाहे वर की प्राप्ति: कुंवारी कन्याएं भी उत्तम वर की प्राप्ति के लिए इस व्रत को रखती हैं। माता पार्वती की तरह ही योग्य और प्रेम करने वाला जीवनसाथी पाने की इच्छा से रखा गया यह व्रत फलदायी माना जाता है।
- संतति सुख: कई महिलाएं संतान सुख की कामना से भी इस व्रत को रखती हैं।
- आध्यात्मिक शुद्धि: व्रत रखने से शारीरिक और मानसिक शुद्धि होती है। कठिन तपस्या और भगवान के प्रति पूर्ण समर्पण व्यक्ति को आंतरिक शांति और संतोष प्रदान करता है।
- पारिवारिक एकता: तीज का पर्व परिवार के सदस्यों को एक साथ लाने का एक अवसर भी होता है। महिलाएं एकत्रित होकर पूजा करती हैं, गीत गाती हैं और एक-दूसरे के साथ अपनी खुशियां साझा करती हैं, जिससे पारिवारिक बंधन मजबूत होते हैं।
- आत्म-नियंत्रण और दृढ़ इच्छाशक्ति: निर्जला व्रत रखने से आत्म-नियंत्रण और दृढ़ इच्छाशक्ति का विकास होता है, जो जीवन के अन्य क्षेत्रों में भी सफलता प्राप्त करने में सहायक होता है।
तीज व्रत की तैयारी
तीज का व्रत एक महत्वपूर्ण अनुष्ठान है, जिसकी तैयारी एक दिन पहले से ही शुरू हो जाती है:
- उपवास से पहले का भोजन: हरतालिका तीज जैसे निर्जला व्रत के लिए, व्रत से एक दिन पहले शाम को सात्विक और पौष्टिक भोजन करना चाहिए ताकि अगले दिन ऊर्जा बनी रहे। कई क्षेत्रों में, सुबह सूर्योदय से पहले 'सरगी' खाने की परंपरा है, जिसमें फल, मिठाई और पेय पदार्थ शामिल होते हैं, ताकि पूरे दिन ऊर्जा बनी रहे।
- शरीर की शुद्धि: व्रत के दिन सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करने चाहिए।
- श्रृंगार और मेहंदी: महिलाएं हाथों में मेहंदी लगाती हैं, जो सौभाग्य का प्रतीक है। सोलह श्रृंगार की अन्य सामग्री भी तैयार कर ली जाती है।
- पूजा सामग्री एकत्र करना: पूजा के लिए आवश्यक सभी सामग्री को पहले से ही एकत्र कर लेना चाहिए, ताकि पूजा के समय किसी प्रकार की बाधा न आए।
- पूजा स्थल की सफाई: जहां पूजा करनी है, उस स्थान को अच्छी तरह से साफ करके गंगाजल छिड़ककर पवित्र कर लेना चाहिए।
तीज पूजा सामग्री और उनका महत्व
तीज की पूजा में उपयोग की जाने वाली प्रत्येक सामग्री का अपना विशेष महत्व होता है। यहां मुख्य सामग्री और उनके महत्व की सूची दी गई है:
- भगवान शिव, माता पार्वती और गणेश जी की प्रतिमा/चित्र: ये पूजा के मुख्य आधार हैं, जिनके माध्यम से हम देवताओं का आह्वान करते हैं। हरतालिका तीज में बालू या मिट्टी से प्रतिमाएं बनाना विशेष है।
- पूजन चौकी: देवताओं को विराजित करने का स्थान, जो सम्मान का प्रतीक है।
- पीला या लाल वस्त्र: चौकी पर बिछाने के लिए। ये शुभता और पवित्रता के रंग हैं।
- केले के पत्ते: पूजा स्थल को सजाने और पवित्रता के लिए उपयोग किए जाते हैं।
- गंगाजल: पवित्रता और शुद्धि के लिए। पूजा सामग्री और स्थान को शुद्ध करने हेतु।
- पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, चीनी): देवताओं को स्नान कराने और अर्पित करने के लिए। यह पांच पवित्र तत्वों का मिश्रण है।
- चंदन, रोली, कुमकुम, सिंदूर: देवताओं को तिलक लगाने और अर्पित करने के लिए। ये सम्मान, शुभता और सौभाग्य के प्रतीक हैं।
- धूप, दीपक (घी/तेल): वातावरण को सुगंधित करने और अंधकार को दूर करने के लिए। दीपक ज्ञान और प्रकाश का प्रतीक है।
- पुष्प, बेलपत्र, शमी पत्र, दूर्वा: देवताओं को अर्पित करने के लिए। बेलपत्र भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है, जबकि दूर्वा गणेश जी को। पुष्प सुंदरता और भक्ति का प्रतीक हैं।
- फल, मिठाई, नारियल: नैवेद्य के रूप में देवताओं को अर्पित करने के लिए। यह हमारी श्रद्धा और कृतज्ञता का प्रतीक है।
- पान, सुपारी, लौंग, इलायची: भोग के साथ देवताओं को अर्पित किए जाते हैं।
- मिठाई, ठेकुआ, पंजीरी: विशेष रूप से बनाए जाने वाले पकवान, जो प्रसाद के रूप में चढ़ाए जाते हैं।
- माता पार्वती के लिए सोलह श्रृंगार सामग्री: बिंदी, सिंदूर, चूड़ियां, मेहंदी, आलता, महावर, बिछिया, पायल, कंघी, दर्पण आदि। ये सौभाग्य और सुहाग के प्रतीक हैं, जिन्हें माता पार्वती को अर्पित करने से अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद मिलता है।
- नवीन वस्त्र: स्वयं पहनने और देवताओं को अर्पित करने के लिए।
- दक्षणा (पैसे): पूजा के बाद ब्राह्मण या गरीबों को दान करने के लिए।
- कलश (जल से भरा): शुभता, पवित्रता और संपन्नता का प्रतीक। इसमें जल, सिक्के, सुपारी आदि रखे जाते हैं।
- अक्षत (चावल): अखंडित चावल, जो शुभता, पूर्णता और समृद्धि का प्रतीक हैं।
- पूजा की थाली: सभी सामग्री को व्यवस्थित रखने के लिए।
- कथा पुस्तक: तीज व्रत कथा पढ़ने के लिए।
तीज पूजा की सही विधि
तीज का व्रत विधि-विधान से करने पर ही पूर्ण फल प्राप्त होता है। यहां पूजा की विस्तृत विधि बताई गई है:
1. व्रत का संकल्प
- सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नानादि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
- हाथ में जल, पुष्प और अक्षत लेकर व्रत का संकल्प लें। कहें, "हे भगवान शिव और माता पार्वती, मैं (अपना नाम) अपने पति की लंबी आयु और सौभाग्य की कामना के लिए यह निर्जला तीज व्रत रख रही हूं। आप मुझे यह व्रत पूर्ण करने की शक्ति प्रदान करें और मेरी मनोकामना पूर्ण करें।" कुंवारी कन्याएं मनचाहे वर की प्राप्ति के लिए संकल्प लें।
2. मूर्ति स्थापना और पूजन चौकी
- पूजा स्थल पर एक चौकी स्थापित करें और उस पर पीला या लाल वस्त्र बिछाएं।
- केले के पत्ते से चौकी को सजाएं।
- इस पर भगवान शिव, माता पार्वती और गणेश जी की मिट्टी या बालू से बनी प्रतिमाएं स्थापित करें।
- एक कलश में जल भरकर उसके मुख पर नारियल रखकर चौकी के पास रखें।
3. गणेश पूजा
- सबसे पहले गणेश जी का पूजन करें। उन्हें जल, दूर्वा, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य (मोदक या लड्डू) अर्पित करें।
- गणेश जी से प्रार्थना करें कि पूजा निर्विघ्न संपन्न हो।
4. शिव-पार्वती पूजा
- आवाहन: भगवान शिव और माता पार्वती का आवाहन करें।
- आसन: उन्हें आसन ग्रहण कराएं।
- स्नान: पंचामृत और फिर शुद्ध जल से स्नान कराएं।
- वस्त्र: उन्हें नवीन वस्त्र अर्पित करें।
- चंदन, रोली, सिंदूर: शिव जी को चंदन और रोली लगाएं। माता पार्वती को कुमकुम और सिंदूर लगाएं।
- फूल और माला: शिव जी को बेलपत्र, शमी पत्र, धतूरा और आक के फूल चढ़ाएं। माता पार्वती को लाल पुष्प, विशेषकर गुड़हल का फूल और माला अर्पित करें।
- धूप-दीप: धूप जलाएं और घी का दीपक प्रज्वलित करें।
- नैवेद्य: फल, मिठाई, ठेकुआ, पंजीरी, नारियल आदि का भोग लगाएं। पान, सुपारी, लौंग, इलायची भी अर्पित करें।
- सोलह श्रृंगार: माता पार्वती को सोलह श्रृंगार की सभी सामग्री (बिंदी, चूड़ी, मेहंदी, सिंदूर आदि) अर्पित करें। यह सौभाग्य का प्रतीक है।
5. तीज व्रत कथा श्रवण
- पूजा के दौरान तीज व्रत कथा अवश्य सुनें या पढ़ें। कथा सुनने से व्रत का पूर्ण फल प्राप्त होता है।
6. मंत्र जप और आरती
- पूजा के बाद 'ओम नमः शिवाय' और 'ओम उमामहेश्वराय नमः' मंत्र का जाप करें।
- इसके बाद भगवान शिव, माता पार्वती और गणेश जी की आरती करें।
- आरती के बाद सभी देवी-देवताओं को प्रणाम करें और क्षमा प्रार्थना करें।
7. रात्रि जागरण (हरतालिका तीज के लिए विशेष)
- हरतालिका तीज में रात भर जागरण करके भजन-कीर्तन करने की परंपरा है। यह तपस्या का एक हिस्सा माना जाता है।
तीज व्रत के नियम और सावधानियां
तीज का व्रत पूरी निष्ठा और नियमों के साथ करना चाहिए, ताकि इसका पूर्ण लाभ मिल सके:
- निर्जला व्रत: हरतालिका तीज में महिलाएं अन्न और जल दोनों का त्याग करती हैं। हरियाली और कजरी तीज में फलाहार या जल ग्रहण किया जा सकता है, लेकिन संकल्प के अनुसार ही व्रत रखें।
- स्वच्छता और पवित्रता: व्रत के दौरान शरीर और मन दोनों की पवित्रता बनाए रखें। सात्विक विचार रखें।
- क्रोध और निंदा से बचें: व्रत के दौरान किसी पर क्रोध न करें, किसी की निंदा न करें और अपशब्दों का प्रयोग न करें। मन को शांत रखें।
- अहिंसा: किसी भी जीव को कष्ट न पहुंचाएं।
- भूमि पर शयन: कुछ महिलाएं व्रत के दौरान भूमि पर शयन करती हैं, जो तपस्या का प्रतीक है।
- पूजा विधि का पालन: पूजा को विधि-विधान से संपन्न करें और किसी भी महत्वपूर्ण सामग्री या चरण को न छोड़ें।
- पारण का सही समय: व्रत का पारण सही समय और विधि से ही करें।
व्रत का पारण (Breaking the Fast)
तीज व्रत का पारण बहुत महत्वपूर्ण होता है और इसे विधिपूर्वक करना चाहिए। हरतालिका तीज में पारण अगले दिन सुबह की पूजा के बाद किया जाता है, जबकि कजरी तीज में चंद्रमा के दर्शन के बाद।
- पारण की विधि: पूजा संपन्न होने के बाद, सबसे पहले जल ग्रहण करें।
- इसके बाद सात्विक फलाहार या भोजन ग्रहण करें।
- दान-दक्षिणा: व्रत का पारण करने से पहले किसी ब्राह्मण को भोजन कराएं या दान-दक्षिणा दें। सोलह श्रृंगार की सामग्री किसी सुहागिन स्त्री या अपनी सास को दान देना शुभ माना जाता है।
निष्कर्ष
तीज का व्रत भारतीय संस्कृति में प्रेम, त्याग, निष्ठा और समर्पण का एक सुंदर प्रतीक है। यह सिर्फ एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि महिलाओं की आध्यात्मिक शक्ति और उनके परिवार के प्रति अगाध प्रेम का प्रकटीकरण है। माता पार्वती और भगवान शिव के पवित्र बंधन की प्रेरणा लेकर रखा गया यह व्रत सुहागिनों को अखंड सौभाग्य और सुखमय वैवाहिक जीवन का आशीर्वाद देता है, वहीं कुंवारी कन्याओं को मनचाहे जीवनसाथी की प्राप्ति में सहायक होता है। इस पवित्र पर्व को विधि-विधान और पूर्ण श्रद्धा के साथ मनाकर हम न केवल धार्मिक लाभ प्राप्त करते हैं, बल्कि अपने जीवन में शांति, सुख और समृद्धि भी लाते हैं।
हमें उम्मीद है कि यह विस्तृत जानकारी आपको तीज का व्रत सही ढंग से समझने और मनाने में सहायक होगी। सभी श्रद्धालुओं को तीज की हार्दिक शुभकामनाएं!
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
Q: तीज का व्रत क्यों रखा जाता है?
यह व्रत मुख्य रूप से सुहागिन महिलाओं द्वारा अपने पति की लंबी आयु, उत्तम स्वास्थ्य और सौभाग्य की कामना के लिए रखा जाता है। कुंवारी कन्याएं भी अच्छे वर की प्राप्ति के लिए इस व्रत को रखती हैं।
Q: तीज का व्रत कौन से देवी-देवता के अटूट प्रेम का प्रतीक है?
यह व्रत भगवान शिव और माता पार्वती के अटूट प्रेम और मिलन का प्रतीक है।
Q: तीज व्रत का ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व क्या है?
पौराणिक कथाओं के अनुसार, माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की थी। उनके इस कठिन तप से भगवान शिव प्रसन्न हुए और उन्होंने माता पार्वती को अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया।
Q: हरतालिका तीज क्यों कहलाती है?
माता पार्वती ने शिवजी को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए अपनी सहेलियों के साथ एक हरण करके तपस्या की थी, इसीलिए इसे 'हरतालिका' कहा जाता है।
Q: लेख के अनुसार तीज के कितने मुख्य प्रकार बताए गए हैं?
भारत के विभिन्न क्षेत्रों में मुख्य रूप से तीन प्रकार की तीज मनाई जाती हैं, जिनमें हरियाली तीज और कजरी तीज का उल्लेख किया गया है।
Q: हरियाली तीज कब मनाई जाती है?
हरियाली तीज श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाई जाती है, जो आमतौर पर जुलाई या अगस्त के महीने में आती है।
Q: हरियाली तीज का महत्व क्या है?
यह तीज प्रकृति की हरियाली और नवजीवन का प्रतीक है। यह व्रत भगवान शिव और माता पार्वती के मिलन की खुशी में मनाया जाता है।
Q: हरियाली तीज पर महिलाएं कौन सी विशेष परंपराएं निभाती हैं?
इस दिन महिलाएं हरे वस्त्र पहनती हैं, हरी चूड़ियां पहनती हैं और हाथों में मेहंदी रचाती हैं। नवविवाहिताएं अपने मायके जाती हैं और झूला झूलने, लोकगीत गाने की परंपरा है।
Q: कजरी तीज कब मनाई जाती है?
कजरी तीज भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि को आती है, जो आमतौर पर अगस्त या सितंबर के महीने में पड़ती है।
Q: कजरी तीज को किस अन्य नाम से जाना जाता है और इसका क्या महत्व है?
कजरी तीज को 'बड़ी तीज' भी कहा जाता है और यह हरियाली तीज से अधिक महत्वपूर्ण मानी जाती है। यह व्रत पति की लंबी आयु के लिए रखा जाता है।
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