विश्वकर्मा पूजा 2026: पाएं धन, तरक्की और समृद्धि का आशीर्वाद, जानें इसका महत्व
- द्वारा प्रार्थना संपादकीय टीम
- प्रकाशित: September 15, 2026
- अंतिम अपडेट: September 15, 2026
- 10 Mins

सृष्टि के सबसे पहले इंजीनियर, दिव्य वास्तुकार और समस्त शिल्पकारों के आराध्य देव भगवान विश्वकर्मा की महिमा अपरंपार है। हर वर्ष, जब सूर्य कन्या राशि में प्रवेश करते हैं, उस विशेष दिन को विश्वकर्मा पूजा के रूप में मनाया जाता है। यह दिन उन सभी लोगों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है जो अपने जीवन में धन, तरक्की और समृद्धि की कामना करते हैं, विशेषकर वे जो अपने हाथों, औजारों और मशीनों के माध्यम से अपना जीवन यापन करते हैं। वर्ष 2026 में भी, यह पावन पर्व बड़ी श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाएगा, और इस दिन की गई पूजा भक्तों को असीम लाभ प्रदान करेगी।
यह सिर्फ मशीनों और औजारों की पूजा का दिन नहीं है, बल्कि यह अपने कर्म के प्रति समर्पण, अपनी आजीविका के साधनों के प्रति कृतज्ञता और निर्माण की शक्ति का सम्मान करने का भी एक प्रतीक है। इस विस्तृत लेख में, हम विश्वकर्मा पूजा 2026 के महत्व, पूजा विधि, शुभ मुहूर्त, भगवान विश्वकर्मा से जुड़ी पौराणिक कथाओं और इस पूजा से प्राप्त होने वाले अनमोल आशीर्वादों पर विस्तार से चर्चा करेंगे।
भगवान विश्वकर्मा कौन हैं?
हिंदू धर्मग्रंथों के अनुसार, भगवान विश्वकर्मा को देवताओं के शिल्पी, वास्तुकार और इंजीनियर के रूप में पूजा जाता है। उन्हें ब्रह्मांड के सृजनकर्ता ब्रह्मा जी का मानस पुत्र माना जाता है। वे सिर्फ भवनों के निर्माता ही नहीं, बल्कि समस्त यंत्रों, औजारों और अस्त्र-शस्त्रों के भी जनक हैं। ऋग्वेद में उनका उल्लेख सृष्टि के निर्माता और समस्त कलाओं के स्वामी के रूप में किया गया है। उन्हें ‘देवताओं का बढ़ई’ या ‘देवशिल्पी’ के नाम से भी जाना जाता है।
पौराणिक महत्व और उनकी दिव्य रचनाएँ
भगवान विश्वकर्मा का पौराणिक महत्व अत्यंत गहरा और विशाल है। उन्होंने देवताओं के लिए कई अद्भुत संरचनाओं का निर्माण किया, जिनकी कल्पना करना भी मुश्किल है। उनकी कुछ प्रमुख दिव्य रचनाएँ इस प्रकार हैं:
- स्वर्ग लोक: देवताओं का निवास स्थान।
- लंका नगरी: रावण की स्वर्ण नगरी, जिसे उन्होंने भगवान शिव के लिए बनाया था।
- द्वारका नगरी: भगवान कृष्ण की अद्भुत नगरी, जिसे उन्होंने समुद्र के बीचों-बीच स्थापित किया।
- इंद्रप्रस्थ: पांडवों की भव्य राजधानी।
- सुदर्शन चक्र: भगवान विष्णु का अमोघ अस्त्र।
- पुष्पक विमान: रावण का मायावी विमान।
- वज्र: देवराज इंद्र का शक्तिशाली अस्त्र, जिसे उन्होंने दधीचि ऋषि की हड्डियों से बनाया था।
- भगवान जगन्नाथ का मंदिर: पुरी में स्थित इस प्रसिद्ध मंदिर का निर्माण भी भगवान विश्वकर्मा ने ही किया था।
वे न केवल इन भव्य संरचनाओं के निर्माता थे, बल्कि उन्होंने समस्त शिल्प विद्या, वास्तु शास्त्र और यंत्र विद्या का ज्ञान भी मनुष्यों को प्रदान किया। इसीलिए, उन्हें समस्त कर्मकारों, कलाकारों, इंजीनियरों और औद्योगिक संस्थानों का अधिष्ठाता देव माना जाता है। उनकी पूजा करने से व्यक्ति के काम में कुशलता आती है, रचनात्मकता बढ़ती है और उसे अपने प्रयासों में सफलता मिलती है।
विश्वकर्मा पूजा 2026 का महत्व
विश्वकर्मा पूजा का महत्व न केवल आध्यात्मिक है, बल्कि यह व्यावसायिक और व्यक्तिगत जीवन में भी गहरा प्रभाव डालता है। यह दिन विशेष रूप से औद्योगिक प्रतिष्ठानों, कारखानों, दुकानों, वर्कशॉप, गैरेज और उन सभी स्थानों पर मनाया जाता है जहाँ मशीनों और औजारों का प्रयोग होता है। इस दिन सभी औजारों और मशीनों की साफ-सफाई की जाती है, उन्हें सम्मान दिया जाता है और उनकी पूजा की जाती है।
धन, तरक्की और समृद्धि के लिए विश्वकर्मा पूजा
भगवान विश्वकर्मा की पूजा धन, तरक्की और समृद्धि के लिए अत्यंत फलदायी मानी जाती है। भक्त मानते हैं कि इस दिन श्रद्धापूर्वक पूजा करने से भगवान विश्वकर्मा प्रसन्न होते हैं और उन्हें निम्नलिखित लाभ प्रदान करते हैं:
- व्यवसाय में वृद्धि: उद्योगों और व्यवसायों से जुड़े लोग इस दिन अपनी मशीनों और औजारों की पूजा करके अपने व्यापार में वृद्धि और लाभ की कामना करते हैं। माना जाता है कि भगवान विश्वकर्मा की कृपा से उत्पादन बढ़ता है और कार्य निर्बाध रूप से चलते हैं।
- तकनीकी कौशल में सुधार: कारीगर, शिल्पकार, इंजीनियर और तकनीशियन अपनी कला और कौशल में निपुणता प्राप्त करने के लिए इस दिन पूजा करते हैं। इससे उनके काम में सटीकता और रचनात्मकता आती है।
- दुर्घटनाओं से बचाव: मशीनों और औजारों से जुड़े कार्यों में दुर्घटनाओं का खतरा बना रहता है। इस पूजा से यह विश्वास जुड़ा है कि भगवान विश्वकर्मा कार्यस्थल पर सुरक्षा प्रदान करते हैं और दुर्घटनाओं से बचाते हैं।
- आर्थिक स्थिरता: जो लोग अपने श्रम और कौशल से आजीविका कमाते हैं, उनके लिए यह पूजा आर्थिक स्थिरता और समृद्धि का मार्ग खोलती है। यह धन की आवक सुनिश्चित करती है और गरीबी को दूर करती है।
- करियर में सफलता: छात्रों और पेशेवरों के लिए जो तकनीकी या इंजीनियरिंग के क्षेत्र में हैं, यह पूजा उनके करियर में सफलता और उच्च पदों तक पहुँचने में सहायक सिद्ध होती है।
- नए अवसरों का आगमन: भगवान विश्वकर्मा की कृपा से नए व्यापारिक अवसर और रचनात्मक परियोजनाएं जीवन में आती हैं, जिससे समग्र तरक्की का मार्ग प्रशस्त होता है।
- कर्म के प्रति समर्पण: यह पूजा व्यक्ति को अपने काम और उपकरणों के प्रति सम्मान और समर्पण की भावना सिखाती है। यह याद दिलाती है कि हमारे कर्म ही हमें सफलता और समृद्धि की ओर ले जाते हैं।
संक्षेप में, विश्वकर्मा पूजा व्यक्ति के जीवन के भौतिक और व्यावसायिक पहलुओं को सशक्त बनाने का एक शक्तिशाली माध्यम है। यह हमारे कार्यों, हमारे औजारों और हमारी आजीविका के स्रोतों के प्रति आभार व्यक्त करने का एक पवित्र अवसर है।
विश्वकर्मा पूजा 2026: शुभ मुहूर्त और तिथि
विश्वकर्मा पूजा प्रतिवर्ष कन्या संक्रांति के दिन मनाई जाती है। कन्या संक्रांति वह समय होता है जब सूर्य सिंह राशि से कन्या राशि में गोचर करते हैं। ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार, यह तिथि सामान्यतः 17 सितंबर को पड़ती है, लेकिन कभी-कभी कुछ मिनटों के अंतर के कारण यह 16 या 18 सितंबर को भी हो सकती है। चूंकि यह सूर्य के गोचर पर आधारित है, इसलिए इसकी तिथि लगभग निश्चित रहती है।
विश्वकर्मा पूजा 2026 की तिथि:
हालांकि वर्ष 2026 के लिए सटीक शुभ मुहूर्त और तिथि की घोषणा विस्तृत पंचांग गणना के बाद ही की जाएगी, लेकिन यह सामान्यतः 17 सितंबर 2026 को ही मनाई जाएगी। आपको सटीक मुहूर्त के लिए अपने स्थानीय पंचांग या विश्वसनीय ज्योतिषीय स्रोत की सलाह लेने की सलाह दी जाती है, क्योंकि पूजा के लिए विशेष शुभ चौघड़िया मुहूर्त महत्वपूर्ण होता है। पूजा सामान्यतः सूर्योदय के बाद और दोपहर से पहले की जाती है।
कन्या संक्रांति पुण्य काल: कन्या संक्रांति पर विशेष पुण्य काल होता है, जिसमें पूजा और दान-पुण्य करना अत्यंत शुभ माना जाता है। इस पुण्य काल का आरंभ और समापन सूर्य के कन्या राशि में प्रवेश के समय के अनुसार होता है। भक्त इस अवधि में अपनी पूजा-अर्चना और विशेष अनुष्ठान संपन्न कर सकते हैं।
विश्वकर्मा पूजा की सही विधि
विश्वकर्मा पूजा को श्रद्धा और विधि-विधान से करने पर ही उसका पूर्ण फल प्राप्त होता है। यहाँ पूजा की विस्तृत विधि दी गई है:
पूजा सामग्री
पूजा शुरू करने से पहले, सुनिश्चित कर लें कि आपके पास सभी आवश्यक सामग्री उपलब्ध हो:
- भगवान विश्वकर्मा की प्रतिमा या तस्वीर।
- एक साफ चौकी (पूजा के लिए मंच)।
- लाल या पीला वस्त्र (चौकी पर बिछाने के लिए)।
- अक्षत (साबुत चावल)।
- पुष्प (गुलाब, गेंदा या अन्य सुगंधित फूल)।
- धूप, दीप और अगरबत्ती।
- गंगाजल (पवित्र जल)।
- पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद और चीनी का मिश्रण)।
- फल (केला, सेब, अमरूद आदि)।
- मिठाई (लड्डू, पेड़ा या अन्य)।
- पान के पत्ते और सुपारी।
- हल्दी, कुमकुम (रोली) और चंदन।
- यंत्र, औजार और मशीनें जिनकी पूजा करनी है।
- एक कलश (मिट्टी या तांबे का)।
- ताजे नारियल (कलश पर रखने के लिए)।
- मोली या कलावा (पवित्र धागा)।
- दक्षिणा (सामर्थ्य अनुसार)।
- जल से भरा लोटा।
पूजा विधि (विस्तार से)
- स्वच्छता और शुद्धिकरण: पूजा करने वाले व्यक्ति को स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करने चाहिए। पूजा स्थल और उन सभी औजारों, मशीनों को अच्छी तरह साफ करना चाहिए जिनकी पूजा करनी है। सभी औजारों पर गंगाजल छिड़ककर उन्हें पवित्र करें।
- चौकी स्थापना: एक साफ चौकी पर लाल या पीला वस्त्र बिछाएं। उस पर भगवान विश्वकर्मा की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें। यदि प्रतिमा उपलब्ध न हो, तो आप अपने कार्यस्थल पर भगवान विश्वकर्मा की तस्वीर लगा सकते हैं।
- कलश स्थापना: चौकी के दायीं ओर एक कलश स्थापित करें। कलश में जल भरें, उसमें कुछ सिक्के, सुपारी, अक्षत और एक पुष्प डालें। कलश के मुख पर आम के पत्ते लगाकर उस पर एक नारियल रखें। कलश को कलावा बांधें।
- दीपक प्रज्वलन: भगवान विश्वकर्मा के समक्ष शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करें। धूप और अगरबत्ती जलाएं ताकि पूजा स्थल सुगंधित हो जाए।
- तिलक और पुष्प अर्पण: भगवान विश्वकर्मा को हल्दी, कुमकुम और चंदन का तिलक लगाएं। उन्हें अक्षत और ताजे पुष्प अर्पित करें। "ॐ श्री विश्वकर्मणे नमः" मंत्र का जाप करते हुए फूल चढ़ाएं।
- पंचामृत स्नान और वस्त्र: यदि प्रतिमा छोटी है, तो उसे पंचामृत से स्नान कराएं और फिर शुद्ध जल से धोकर साफ वस्त्र से पोंछ लें। इसके बाद उन्हें नया वस्त्र या कलावा अर्पित करें।
- भोग अर्पण: भगवान विश्वकर्मा को फल, मिठाई, पान-सुपारी और नारियल का भोग लगाएं। यह भोग श्रद्धा भाव से समर्पित करना चाहिए।
- औजारों की पूजा: अब उन सभी औजारों और मशीनों की पूजा करें जिनकी आप दैनिक जीवन में उपयोग करते हैं। प्रत्येक औजार पर हल्दी-कुमकुम का तिलक लगाएं, अक्षत चढ़ाएं और उन पर मोली या कलावा बांधें। यह प्रतीकात्मक रूप से औजारों को भगवान का रूप मानकर उनका सम्मान करना है।
- मंत्र जाप: भगवान विश्वकर्मा के निम्नलिखित मंत्रों का श्रद्धापूर्वक जाप करें। आप कम से कम 108 बार जाप कर सकते हैं।
- मुख्य मंत्र: "ॐ श्री विश्वकर्मणे नमः।"
- विश्वकर्मा गायत्री मंत्र: "ॐ आधार शक्तये नमः, ॐ कूर्मिणे नमः, ॐ अनन्ताय नमः, ॐ पृथिव्यै नमः।"
- विश्वकर्मा चालीसा और स्तोत्र पाठ: यदि संभव हो, तो विश्वकर्मा चालीसा या विश्वकर्मा स्तोत्र का पाठ करें। यह भगवान विश्वकर्मा की स्तुति और महिमा का वर्णन करता है।
- आरती: अंत में, भगवान विश्वकर्मा की आरती करें। आरती करते समय सभी परिवार के सदस्यों या कार्यस्थल के कर्मचारियों को शामिल करें। आरती के बाद घंटी बजाएं।
- प्रसाद वितरण: पूजा समाप्त होने के बाद, सभी उपस्थित लोगों में प्रसाद वितरित करें। यह प्रसाद आपके परिवार, दोस्तों और कार्यस्थल के कर्मचारियों के बीच बांटें।
- क्षमा याचना: जाने-अनजाने में हुई किसी भी भूल या त्रुटि के लिए भगवान विश्वकर्मा से क्षमा याचना करें और अपनी मनोकामनाओं को पूर्ण करने के लिए प्रार्थना करें।
इस प्रकार श्रद्धा और विधिपूर्वक की गई पूजा निश्चित रूप से भगवान विश्वकर्मा का आशीर्वाद लेकर आएगी और आपके जीवन में धन, तरक्की और समृद्धि लाएगी।
भगवान विश्वकर्मा से जुड़ी एक पौराणिक कथा
भगवान विश्वकर्मा से जुड़ी कई पौराणिक कथाएं हैं जो उनकी अद्भुत शिल्प कौशल को दर्शाती हैं। इनमें से एक कथा भगवान कृष्ण की नगरी द्वारका के निर्माण से संबंधित है।
पौराणिक कथा के अनुसार, जब भगवान कृष्ण ने मथुरा छोड़ कर एक नई नगरी बसाने का निर्णय लिया, तो उन्होंने समुद्र तट पर एक अत्यंत सुंदर और सुरक्षित नगरी बनाने की योजना बनाई। इस कार्य के लिए उन्होंने देवताओं के महान वास्तुकार, भगवान विश्वकर्मा का आह्वान किया।
भगवान कृष्ण ने विश्वकर्मा जी से ऐसी नगरी बनाने का अनुरोध किया जो न केवल भव्य और आकर्षक हो, बल्कि किसी भी शत्रु के लिए अभेद्य भी हो। भगवान विश्वकर्मा ने अपनी दिव्य शक्तियों और अद्वितीय शिल्प कौशल का उपयोग करते हुए एक अद्भुत नगरी का निर्माण किया। उन्होंने समुद्र के भीतर एक विशाल भूमि तैयार की और उस पर ऐसी इमारतें, महल और सड़कें बनाईं, जिनकी कल्पना करना भी असंभव था।
द्वारका नगरी की दीवारें सोने और चांदी से निर्मित थीं, और उस पर हीरे-जवाहरात जड़े हुए थे जो रात में भी चमकते थे। इसकी सड़कें चौड़ी और सुंदर थीं, और हर घर में सुख-सुविधाओं का उत्तम प्रबंध था। विश्वकर्मा जी ने इस नगरी को इस तरह से डिजाइन किया कि यह हमेशा शत्रुओं से सुरक्षित रहे। उन्होंने नगरी के चारों ओर ऐसे मायावी किले और द्वार बनाए, जिन्हें भेद पाना किसी के लिए भी संभव नहीं था। यह नगरी इतनी विशाल और भव्य थी कि इसमें लाखों लोग सुखपूर्वक निवास कर सकते थे।
इस नगरी को बनाने में विश्वकर्मा जी ने अपनी समस्त कला और कौशल का प्रदर्शन किया, और जब द्वारका बनकर तैयार हुई, तो स्वयं देवताओं ने भी उसकी सुंदरता और भव्यता को देखकर आश्चर्य व्यक्त किया। यह नगरी भगवान कृष्ण के निवास के लिए बनाई गई थी और इसे "स्वर्ण द्वारका" के नाम से जाना जाने लगा।
यह कथा भगवान विश्वकर्मा की अतुलनीय निर्माण शक्ति और उनकी रचनात्मक प्रतिभा का प्रमाण है। यह दर्शाता है कि कैसे उनकी कृपा से असंभव भी संभव हो सकता है और कैसे वे अपने भक्तों को उनकी रचनात्मक और व्यावसायिक यात्रा में सफलता प्रदान करते हैं।
विश्वकर्मा जयंती और पूजा के अंतर को समझें
कई बार लोग विश्वकर्मा पूजा और विश्वकर्मा जयंती को एक ही मानते हैं, लेकिन इन दोनों के बीच एक सूक्ष्म अंतर है जिसे समझना आवश्यक है:
- विश्वकर्मा पूजा: यह प्रतिवर्ष कन्या संक्रांति के दिन मनाई जाती है, जब सूर्य सिंह राशि से कन्या राशि में प्रवेश करते हैं (आमतौर पर 17 सितंबर)। इस दिन मुख्य रूप से कर्मकारों, शिल्पकारों, औद्योगिक संस्थानों, मशीनों और औजारों की पूजा की जाती है। यह अपने कर्म और आजीविका के साधनों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करने का दिन है।
- विश्वकर्मा जयंती: यह भगवान विश्वकर्मा के प्रकटोत्सव या उनके जन्मदिवस के रूप में मनाई जाती है। यह माघ मास के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि को पड़ती है। इस दिन भगवान विश्वकर्मा की उत्पत्ति का उत्सव मनाया जाता है और उनकी महिमा का गुणगान किया जाता है।
हालांकि दोनों ही दिन भगवान विश्वकर्मा को समर्पित हैं, लेकिन उनके मनाए जाने का कारण और समय अलग-अलग हैं। अधिकतर लोग 'विश्वकर्मा पूजा' को ही उनके प्रकटोत्सव के रूप में भी संदर्भित करते हैं, विशेषकर औद्योगिक क्षेत्रों में जहां कन्या संक्रांति पर ही बड़े पैमाने पर उत्सव मनाए जाते हैं। दोनों ही अवसरों पर भगवान विश्वकर्मा की स्तुति और पूजा अत्यंत शुभ फलदायी होती है।
निष्कर्ष
विश्वकर्मा पूजा 2026 एक ऐसा पावन पर्व है जो हमें अपने कर्मों, अपनी कला और अपने औजारों के प्रति कृतज्ञता और सम्मान का भाव सिखाता है। यह भगवान विश्वकर्मा की अद्वितीय निर्माण शक्ति का उत्सव है, जो हमें धन, तरक्की और समृद्धि का आशीर्वाद प्रदान करते हैं। इस दिन श्रद्धापूर्वक पूजा करने से कार्यक्षेत्र में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं, तकनीकी कौशल में वृद्धि होती है और व्यवसाय में अभूतपूर्व सफलता मिलती है।
यह सिर्फ मशीनों की पूजा नहीं, बल्कि कर्म की पूजा है; यह हमारे श्रम, हमारे पसीने और हमारे प्रयासों को समर्पित एक अनुष्ठान है। इसलिए, विश्वकर्मा पूजा 2026 के अवसर पर, पूरी निष्ठा और समर्पण के साथ भगवान विश्वकर्मा की आराधना करें और उनके दिव्य आशीर्वाद से अपने जीवन को धन, तरक्की और समृद्धि से परिपूर्ण करें। भगवान विश्वकर्मा आपकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण करें और आपके जीवन में खुशहाली लाएं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
Q: विश्वकर्मा पूजा कब मनाई जाती है?
हर वर्ष, जब सूर्य कन्या राशि में प्रवेश करते हैं, उस विशेष दिन को विश्वकर्मा पूजा के रूप में मनाया जाता है।
Q: भगवान विश्वकर्मा कौन हैं?
हिंदू धर्मग्रंथों के अनुसार, भगवान विश्वकर्मा को देवताओं के शिल्पी, वास्तुकार और इंजीनियर के रूप में पूजा जाता है। उन्हें ब्रह्मांड के सृजनकर्ता ब्रह्मा जी का मानस पुत्र माना जाता है।
Q: भगवान विश्वकर्मा को किन अन्य नामों से जाना जाता है?
उन्हें ‘देवताओं का बढ़ई’ या ‘देवशिल्पी’ के नाम से भी जाना जाता है।
Q: विश्वकर्मा पूजा का मुख्य महत्व क्या है?
यह सिर्फ मशीनों और औजारों की पूजा का दिन नहीं है, बल्कि यह अपने कर्म के प्रति समर्पण, अपनी आजीविका के साधनों के प्रति कृतज्ञता और निर्माण की शक्ति का सम्मान करने का भी एक प्रतीक है। यह धन, तरक्की और समृद्धि के लिए महत्वपूर्ण है।
Q: विश्वकर्मा पूजा किन लोगों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है?
यह दिन उन सभी लोगों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है जो अपने जीवन में धन, तरक्की और समृद्धि की कामना करते हैं, विशेषकर वे जो अपने हाथों, औजारों और मशीनों के माध्यम से अपना जीवन यापन करते हैं।
Q: भगवान विश्वकर्मा की कुछ प्रमुख दिव्य रचनाएँ कौन सी हैं?
उनकी कुछ प्रमुख दिव्य रचनाएँ हैं स्वर्ग लोक, लंका नगरी, द्वारका नगरी, इंद्रप्रस्थ, सुदर्शन चक्र, पुष्पक विमान, वज्र और पुरी में स्थित भगवान जगन्नाथ का मंदिर।
Q: भगवान विश्वकर्मा ने रावण की लंका नगरी का निर्माण किसके लिए किया था?
लंका नगरी का निर्माण उन्होंने भगवान शिव के लिए किया था, जिसे बाद में रावण ने प्राप्त किया।
Q: भगवान कृष्ण की नगरी द्वारका का निर्माण किसने किया था?
भगवान कृष्ण की अद्भुत नगरी द्वारका का निर्माण भगवान विश्वकर्मा ने ही समुद्र के बीचों-बीच स्थापित किया था।
Q: देवराज इंद्र का शक्तिशाली अस्त्र वज्र कैसे बना था?
देवराज इंद्र का शक्तिशाली अस्त्र वज्र भगवान विश्वकर्मा ने दधीचि ऋषि की हड्डियों से बनाया था।
Q: ऋग्वेद में भगवान विश्वकर्मा का उल्लेख किस रूप में किया गया है?
ऋग्वेद में उनका उल्लेख सृष्टि के निर्माता और समस्त कलाओं के स्वामी के रूप में किया गया है।
Q: विश्वकर्मा पूजा मनाने से भक्तों को क्या लाभ प्राप्त होते हैं?
उनकी पूजा करने से व्यक्ति के काम में कुशलता आती है, रचनात्मकता बढ़ती है और उसे अपने प्रयासों में सफलता मिलती है। यह धन, तरक्की और समृद्धि का आशीर्वाद प्रदान करता है।
Q: भगवान विश्वकर्मा को किसका अधिष्ठाता देव माना जाता है?
उन्हें समस्त कर्मकारों, कलाकारों, इंजीनियरों और औद्योगिक संस्थानों का अधिष्ठाता देव माना जाता है।
Q: विश्वकर्मा पूजा विशेष रूप से किन स्थानों पर मनाई जाती है?
यह दिन विशेष रूप से औद्योगिक प्रतिष्ठानों, कारखानों, दुकानों, वर्कशॉप, गैरेज और उन सभी स्थानों पर मनाया जाता है जहाँ मशीनों और औजारों का प्रयोग होता है।
Q: विश्वकर्मा पूजा के दिन क्या कार्य किए जाते हैं?
इस दिन सभी औजारों और मशीनों की साफ-सफाई की जाती है, उन्हें सम्मान दिया जाता है और उनकी पूजा की जाती है।
Q: भगवान विश्वकर्मा ने मनुष्यों को कौन सा ज्ञान प्रदान किया?
उन्होंने मनुष्यों को समस्त शिल्प विद्या, वास्तु शास्त्र और यंत्र विद्या का ज्ञान प्रदान किया।
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