गुरु प्रदोष व्रत 2026: 24 सितंबर को ऐसे करें पूजा, शिव कृपा से दूर होंगे सभी कष्ट
- द्वारा प्रार्थना संपादकीय टीम
- प्रकाशित: September 16, 2026
- अंतिम अपडेट: September 16, 2026
- 8 Mins

सनातन धर्म में व्रतों और त्योहारों का विशेष महत्व है, और इन्हीं में से एक अत्यंत पावन और फलदायी व्रत है - प्रदोष व्रत। जब यह प्रदोष व्रत गुरुवार के दिन पड़ता है, तो इसे गुरु प्रदोष व्रत कहा जाता है, जिसका महत्व कई गुना बढ़ जाता है। वर्ष 2026 में, गुरु प्रदोष व्रत 24 सितंबर को पड़ रहा है, जो भगवान शिव और गुरु बृहस्पति दोनों की कृपा प्राप्त करने का एक अद्भुत अवसर है। यह दिन भक्तों के लिए शिव कृपा से सभी कष्टों से मुक्ति पाने, मनोकामनाएं पूर्ण करने और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त करने का सुनहरा मौका लेकर आएगा।
इस लेख में, हम आपको गुरु प्रदोष व्रत 2026 के महत्व, 24 सितंबर को पड़ने वाले इस विशेष दिन की पूजा विधि, भगवान शिव को प्रसन्न करने के अनुष्ठानों, इस व्रत के अतुलनीय लाभों और इससे जुड़ी पौराणिक कथाओं के बारे में विस्तार से बताएंगे। तो आइए, इस पावन यात्रा पर हमारे साथ चलें और भगवान शिव की असीम कृपा प्राप्त करने का मार्ग जानें।
गुरु प्रदोष व्रत का महत्व: शिव और गुरु बृहस्पति का अद्भुत संयोग
प्रदोष व्रत भगवान शिव को समर्पित होता है और प्रत्येक माह की त्रयोदशी तिथि को मनाया जाता है। प्रदोष का अर्थ है 'संध्याकाल', और यह वह विशेष समय होता है जब भगवान शिव कैलाश पर्वत पर आनंद तांडव करते हैं और भक्तों की प्रार्थनाओं को सुनते हैं। इस समय पूजा करने से भगवान शिव अत्यंत शीघ्र प्रसन्न होते हैं और भक्तों को मनवांछित फल प्रदान करते हैं।
लेकिन, जब प्रदोष व्रत गुरुवार के दिन पड़ता है, तो इसे गुरु प्रदोष व्रत कहा जाता है, और इसका महत्व और भी बढ़ जाता है। गुरुवार का दिन भगवान विष्णु और बृहस्पति देव को समर्पित है। ज्योतिष शास्त्र में, बृहस्पति ग्रह को ज्ञान, बुद्धि, धर्म, संतान, विवाह और सौभाग्य का कारक माना जाता है।
- गुरु ग्रह की अनुकूलता: गुरु प्रदोष व्रत करने से भगवान शिव के साथ-साथ गुरु बृहस्पति की भी कृपा प्राप्त होती है। जिन जातकों की कुंडली में गुरु ग्रह कमजोर हो या प्रतिकूल प्रभाव दे रहा हो, उन्हें इस व्रत से विशेष लाभ मिलता है। गुरु ग्रह मजबूत होने से व्यक्ति को ज्ञान, विवेक, आर्थिक समृद्धि और सामाजिक प्रतिष्ठा प्राप्त होती है।
- संतान प्राप्ति: निःसंतान दंपति संतान प्राप्ति के लिए इस व्रत को श्रद्धापूर्वक करते हैं। भगवान शिव और गुरु बृहस्पति की कृपा से संतान सुख की प्राप्ति होती है।
- समस्त कष्टों का निवारण: यह व्रत जीवन के सभी कष्टों, बाधाओं और शत्रुओं से मुक्ति दिलाता है। भगवान शिव की कृपा से शारीरिक, मानसिक और आर्थिक परेशानियां दूर होती हैं।
- मोक्ष की प्राप्ति: धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जो व्यक्ति सच्ची श्रद्धा से गुरु प्रदोष व्रत करता है, उसे मृत्यु के उपरांत मोक्ष की प्राप्ति होती है।
- ज्ञान और बुद्धि में वृद्धि: गुरु प्रदोष व्रत का संबंध गुरु ग्रह से होने के कारण यह व्रत ज्ञान, बुद्धि और विवेक में वृद्धि करता है। छात्रों और अध्यात्मिक पथ पर चलने वाले लोगों के लिए यह अत्यंत शुभ माना जाता है।
24 सितंबर 2026 को पड़ने वाला गुरु प्रदोष व्रत इसलिए भी खास है क्योंकि यह दिन भगवान शिव और गुरु ग्रह दोनों की अनुकूलता प्राप्त करने का दोहरा अवसर प्रदान करता है। यह दिन भक्तों को अपने जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने और आध्यात्मिक शक्ति प्राप्त करने की शक्ति देगा।
24 सितंबर 2026: एक शुभ संयोग और इसकी तैयारी
वर्ष 2026 में 24 सितंबर को गुरुवार के दिन प्रदोष व्रत का पड़ना एक अत्यंत शुभ संयोग है। यह दिन उन सभी भक्तों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण होगा जो भगवान शिव और गुरु बृहस्पति की कृपा एक साथ प्राप्त करना चाहते हैं। इस दिन की गई पूजा और अर्चना का फल कई गुना अधिक प्राप्त होता है।
व्रत की पूर्व तैयारी:
पूजा शुरू करने से पहले कुछ बातों का ध्यान रखना आवश्यक है ताकि पूजा विधि संपन्न हो सके:
- पवित्रता: व्रत के दिन प्रातःकाल उठकर स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूरे दिन मन को शांत और पवित्र रखें।
- पूजा स्थल: घर के मंदिर या पूजा स्थान को अच्छी तरह से साफ करें। गंगाजल से छिड़काव कर स्थान को पवित्र करें।
- पूजा सामग्री एकत्र करें: पूजा के लिए सभी आवश्यक सामग्री पहले से ही एकत्र कर लेनी चाहिए।
आवश्यक पूजा सामग्री:
- भगवान शिव की प्रतिमा या शिवलिंग
- बेलपत्र (कम से कम 11 या 21)
- धतूरा, भांग
- सफेद पुष्प (जैसे चमेली, मदार)
- चंदन (सफेद और लाल)
- अक्षत (चावल)
- धूप, दीपक
- फल (केला, सेब, मौसमी फल)
- मिठाई (विशेषकर खीर या बताशे)
- गंगाजल, शुद्ध जल
- दूध, दही, घी, शहद, शक्कर (पंचामृत बनाने के लिए)
- जनेऊ
- वस्त्र (भगवान को अर्पित करने के लिए)
- दूर्वा (गणेश जी के लिए)
- आरती के लिए कपूर
- कुमकुम, रोली (पार्वती जी के लिए)
गुरु प्रदोष व्रत की पूजा विधि: 24 सितंबर को ऐसे करें अनुष्ठान
प्रदोष व्रत की पूजा संध्याकाल (प्रदोष काल) में की जाती है, जो सूर्यास्त से लगभग 45 मिनट पहले शुरू होकर सूर्यास्त के 45 मिनट बाद तक रहता है। यह वह शुभ मुहूर्त होता है जब भगवान शिव अत्यंत प्रसन्न मुद्रा में होते हैं।
1. प्रातःकाल का संकल्प
- व्रत के दिन सुबह स्नान आदि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र पहनें।
- हाथ में जल, पुष्प और अक्षत लेकर गुरु प्रदोष व्रत का संकल्प लें। मन ही मन भगवान शिव से प्रार्थना करें कि आप यह व्रत निर्विघ्न संपन्न कर सकें और अपनी मनोकामनाएं पूर्ण कर सकें। आप कह सकते हैं, "हे भगवान शिव, मैं (अपना नाम) आज (गुरु प्रदोष व्रत) आपकी कृपा प्राप्त करने और (अपनी मनोकामना) के लिए यह व्रत करने का संकल्प लेता/लेती हूँ। कृपया मुझे शक्ति प्रदान करें।"
- संकल्प लेने के बाद पूरे दिन उपवास रखें। यदि संभव न हो तो फलाहार कर सकते हैं।
2. प्रदोष काल की विस्तृत पूजा विधि
संध्याकाल में, प्रदोष काल शुरू होने पर, पुनः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें (यदि आवश्यक हो)।
- पूजा स्थल की तैयारी: सबसे पहले पूजा स्थान को शुद्ध करें। एक चौकी पर लाल या पीला वस्त्र बिछाकर भगवान शिव और माता पार्वती की प्रतिमा या शिवलिंग स्थापित करें।
- गणेश वंदना: किसी भी शुभ कार्य से पहले भगवान गणेश का पूजन अनिवार्य है। सबसे पहले गणेश जी को जल, दूर्वा, मोदक अर्पित कर उनकी वंदना करें।
- शिवलिंग का अभिषेक:
- सबसे पहले शुद्ध जल से शिवलिंग का अभिषेक करें।
- तत्पश्चात पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर का मिश्रण) से अभिषेक करें। अभिषेक करते समय 'ॐ नमः शिवाय' मंत्र का जाप निरंतर करते रहें।
- पंचामृत अभिषेक के बाद पुनः शुद्ध जल से अभिषेक करें।
- इसके बाद बेलपत्र, धतूरा, भांग, मदार के फूल, सफेद फूल शिवलिंग पर अर्पित करें।
- चंदन और भस्म लेपन: शिवलिंग पर चंदन और भस्म का लेप करें।
- जनेऊ और वस्त्र: भगवान शिव को जनेऊ और वस्त्र अर्पित करें।
- दीप प्रज्वलन: शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करें।
- धूप दिखाना: सुगंधित धूप जलाकर भगवान शिव को अर्पित करें।
- भोग लगाना: मौसमी फल और मिठाई (खीर, बताशे) का भोग लगाएं। ध्यान रहे, शिव को तुलसी वर्जित है, इसलिए तुलसी पत्ता न चढ़ाएं।
- मंत्र जाप:
- भगवान शिव के पंचाक्षर मंत्र 'ॐ नमः शिवाय' का 108 बार जाप करें।
- महामृत्युंजय मंत्र 'ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥' का जाप करना भी अत्यंत लाभकारी होता है।
- शिव चालीसा और स्तुति: शिव चालीसा का पाठ करें और शिव स्तुति गाएं।
- प्रदोष व्रत कथा का श्रवण/वाचन: गुरु प्रदोष व्रत से जुड़ी पौराणिक कथा को पढ़ें या सुनें। कथा श्रवण से व्रत का पूर्ण फल प्राप्त होता है।
- आरती: अंत में भगवान शिव और माता पार्वती की आरती करें। आरती करते समय कपूर या शुद्ध घी के दीपक का उपयोग करें।
- क्षमा याचना: पूजा में हुई किसी भी अनजाने गलती के लिए भगवान शिव से क्षमा याचना करें।
- प्रसाद वितरण: पूजा समाप्त होने के बाद भोग लगाए गए प्रसाद को परिवार के सदस्यों में और अन्य भक्तों में वितरित करें। स्वयं भी प्रसाद ग्रहण करें।
3. व्रत का पारण
अगले दिन (25 सितंबर 2026) सूर्योदय के बाद स्नान आदि से निवृत होकर, भगवान शिव का स्मरण करें और उसके बाद अपना व्रत खोलें। अन्न ग्रहण कर व्रत का पारण करें।
गुरु प्रदोष व्रत के अतुलनीय लाभ
गुरु प्रदोष व्रत को श्रद्धा और विधि-विधान से करने पर भक्तों को अनेक प्रकार के लाभ प्राप्त होते हैं। यह व्रत न केवल आध्यात्मिक उन्नति प्रदान करता है बल्कि भौतिक जीवन में भी सुख-शांति लाता है:
- संपूर्ण कष्टों का निवारण: इस व्रत के प्रभाव से शारीरिक व्याधियाँ, मानसिक तनाव और आर्थिक संकट दूर होते हैं। भगवान शिव अपने भक्तों के सभी कष्ट हर लेते हैं।
- संतान सुख की प्राप्ति: निःसंतान दंपतियों के लिए यह व्रत अत्यंत फलदायी माना जाता है। शिव कृपा से उन्हें संतान सुख की प्राप्ति होती है।
- रोग मुक्ति और उत्तम स्वास्थ्य: जो लोग बार-बार बीमार पड़ते हैं या किसी गंभीर बीमारी से ग्रस्त हैं, उन्हें इस व्रत से स्वास्थ्य लाभ मिलता है।
- धन-धान्य में वृद्धि: गुरु ग्रह के प्रभाव से आर्थिक स्थिति मजबूत होती है और धन-धान्य में वृद्धि होती है। दरिद्रता दूर होती है।
- ज्ञान और बुद्धि का विकास: यह व्रत गुरु ग्रह को मजबूत करता है, जिससे व्यक्ति की बुद्धि तीव्र होती है और ज्ञान में वृद्धि होती है। छात्रों के लिए विशेष लाभकारी।
- विवाह संबंधी बाधाएं दूर: अविवाहित जातकों के विवाह में आ रही बाधाएं दूर होती हैं और योग्य जीवनसाथी की प्राप्ति होती है।
- मोक्ष की प्राप्ति: सच्ची श्रद्धा और भक्ति से किया गया यह व्रत व्यक्ति को मोक्ष की ओर अग्रसर करता है, जिससे जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति मिलती है।
- शत्रुओं पर विजय: यह व्रत शत्रुओं और विरोधी शक्तियों पर विजय प्राप्त करने में सहायक होता है।
- ग्रह दोषों का शमन: कुंडली में उपस्थित अशुभ ग्रह दोषों, विशेषकर गुरु ग्रह से संबंधित दोषों का शमन होता है।
गुरु प्रदोष व्रत से जुड़ी पौराणिक कथा
प्रदोष व्रत से संबंधित कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं, जिनमें से एक कथा गुरु प्रदोष के महत्व को उजागर करती है।
एक पौराणिक कथा के अनुसार, प्राचीन काल में एक नगर में एक बहुत ही धर्मात्मा और दानी ब्राह्मण रहता था, जिसकी मृत्यु हो गई। उसकी पत्नी भी उतनी ही धर्मपरायण थी, लेकिन पति की मृत्यु के बाद वह निःसंतान और निर्धन हो गई। वह अपने पुत्र के साथ दिन में भिक्षा मांगने जाती और शाम को लौटकर अपने पुत्र के साथ भोजन करती।
एक दिन भिक्षा मांगते हुए वह एक मंदिर के पास पहुंची। वहां उसने एक राजकुमार को देखा जो गंभीर रूप से घायल पड़ा था। वह ब्राह्मण विधवा दयालु थी, उसने उस राजकुमार की सेवा की और उसे अपने घर ले आई। उस राजकुमार का नाम धर्मगुप्त था, जिसके पिता की मृत्यु हो चुकी थी और शत्रु राजाओं ने उसका राज्य छीन लिया था।
एक अन्य दिन, ब्राह्मण विधवा अपने पुत्र और राजकुमार धर्मगुप्त के साथ भिक्षाटन के लिए जा रही थी, तभी उनकी भेंट एक संत से हुई। संत ने ब्राह्मण विधवा को बताया कि उसने पिछले जन्म में प्रदोष व्रत का पालन नहीं किया था, जिसके कारण उसे इस जन्म में यह कष्ट झेलना पड़ रहा है। संत ने उसे गुरु प्रदोष व्रत करने की सलाह दी, क्योंकि गुरुवार के दिन प्रदोष पड़ने से यह विशेष फलदायी होता है। उन्होंने कहा कि इस व्रत के प्रभाव से उसके सारे कष्ट दूर हो जाएंगे और उसे संतान सुख के साथ-साथ धन-वैभव की भी प्राप्ति होगी।
ब्राह्मण विधवा ने संत के बताए अनुसार पूरे विधि-विधान से गुरु प्रदोष व्रत रखा। कुछ समय बाद, राजकुमार धर्मगुप्त का विवाह एक गंधर्व कन्या से हो गया। गंधर्व सेना की सहायता से धर्मगुप्त ने अपना राज्य पुनः प्राप्त कर लिया और राजा बन गया। उसने ब्राह्मण पुत्र को अपना प्रधानमंत्री नियुक्त किया और ब्राह्मण विधवा को अपनी मां के समान सम्मान दिया।
इस प्रकार, गुरु प्रदोष व्रत के प्रभाव से ब्राह्मण विधवा और उसके पुत्र के साथ-साथ राजकुमार धर्मगुप्त के जीवन में भी सुख-समृद्धि लौट आई। यह कथा दर्शाती है कि सच्चे मन और श्रद्धा से किया गया गुरु प्रदोष व्रत जीवन के सभी दुखों का नाश कर सुख, समृद्धि और मोक्ष प्रदान करता है।
गुरु प्रदोष व्रत में इन बातों का रखें ध्यान
व्रत करते समय कुछ नियमों का पालन करना अत्यंत आवश्यक है ताकि व्रत का पूर्ण फल प्राप्त हो सके:
- सात्विक भोजन: व्रत के दिन सात्विक भोजन ग्रहण करें (यदि फलाहार कर रहे हों)। लहसुन, प्याज, मांसाहार और तामसिक भोजन से बचें।
- ब्रह्मचर्य का पालन: व्रत के दिन ब्रह्मचर्य का पालन करें।
- क्रोध और लोभ से बचें: मन में किसी के प्रति द्वेष, क्रोध, लोभ या ईर्ष्या न लाएं। शांत और सकारात्मक रहें।
- किसी की निंदा न करें: व्रत के दिन किसी की निंदा न करें और न ही किसी के बारे में बुरा सोचें।
- शुभ कर्म करें: जितना संभव हो सके दान-पुण्य करें और ज़रूरतमंदों की सहायता करें।
- निद्रा त्याग: प्रदोष काल में सोने से बचें। इस समय को पूजा और ध्यान के लिए उपयोग करें।
- जल का सेवन: यदि निर्जल व्रत नहीं रख सकते, तो जल का सेवन कर सकते हैं।
निष्कर्ष
गुरु प्रदोष व्रत 2026, 24 सितंबर को पड़ने वाला, भगवान शिव और गुरु बृहस्पति की संयुक्त कृपा प्राप्त करने का एक अद्वितीय अवसर है। यह व्रत न केवल आपको सांसारिक सुख-समृद्धि प्रदान करेगा, बल्कि आपके आध्यात्मिक पथ को भी प्रकाशित करेगा। सच्चे हृदय और पूर्ण श्रद्धा के साथ इस व्रत को करने वाले भक्तों पर भगवान शिव अपनी असीम कृपा बरसाते हैं और उनके जीवन के सभी कष्टों को दूर करते हैं।
तो, 24 सितंबर 2026 को आने वाले इस पावन गुरु प्रदोष व्रत का लाभ उठाएं। विधि-विधान से पूजा करें, मंत्रों का जाप करें और शिव कृपा से अपने जीवन को धन्य बनाएं। 'ॐ नमः शिवाय' के जाप से वातावरण को पवित्र करें और शिव भक्ति में लीन हो जाएं। भगवान शिव की कृपा से आपके सभी दुख दूर होंगे और आपका जीवन सुख, शांति और समृद्धि से भर जाएगा।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
Q: गुरु प्रदोष व्रत क्या है?
जब प्रदोष व्रत गुरुवार के दिन पड़ता है, तो इसे गुरु प्रदोष व्रत कहा जाता है, जिसका महत्व कई गुना बढ़ जाता है। यह भगवान शिव और गुरु बृहस्पति दोनों की कृपा प्राप्त करने का एक अद्भुत अवसर है।
Q: वर्ष 2026 में गुरु प्रदोष व्रत कब है?
वर्ष 2026 में, गुरु प्रदोष व्रत 24 सितंबर को पड़ रहा है।
Q: प्रदोष व्रत किस देवता को समर्पित होता है?
प्रदोष व्रत भगवान शिव को समर्पित होता है और प्रत्येक माह की त्रयोदशी तिथि को मनाया जाता है।
Q: गुरु प्रदोष व्रत का महत्व क्यों बढ़ जाता है?
जब प्रदोष व्रत गुरुवार के दिन पड़ता है, तो इसे गुरु प्रदोष व्रत कहा जाता है और इसका महत्व और भी बढ़ जाता है क्योंकि गुरुवार का दिन भगवान विष्णु और बृहस्पति देव को समर्पित है।
Q: प्रदोष का अर्थ क्या है और इस समय पूजा क्यों महत्वपूर्ण है?
प्रदोष का अर्थ है 'संध्याकाल', और यह वह विशेष समय होता है जब भगवान शिव कैलाश पर्वत पर आनंद तांडव करते हैं और भक्तों की प्रार्थनाओं को सुनते हैं। इस समय पूजा करने से भगवान शिव अत्यंत शीघ्र प्रसन्न होते हैं।
Q: गुरु प्रदोष व्रत करने से क्या मुख्य लाभ होते हैं?
गुरु प्रदोष व्रत करने से भगवान शिव के साथ-साथ गुरु बृहस्पति की भी कृपा प्राप्त होती है, जिससे संतान प्राप्ति, समस्त कष्टों का निवारण, मोक्ष की प्राप्ति और ज्ञान व बुद्धि में वृद्धि होती है।
Q: गुरु प्रदोष व्रत संतान प्राप्ति के लिए कैसे लाभकारी है?
निःसंतान दंपति संतान प्राप्ति के लिए इस व्रत को श्रद्धापूर्वक करते हैं। भगवान शिव और गुरु बृहस्पति की कृपा से संतान सुख की प्राप्ति होती है।
Q: कुंडली में गुरु ग्रह कमजोर होने पर यह व्रत कैसे सहायता करता है?
जिन जातकों की कुंडली में गुरु ग्रह कमजोर हो या प्रतिकूल प्रभाव दे रहा हो, उन्हें इस व्रत से विशेष लाभ मिलता है। गुरु ग्रह मजबूत होने से व्यक्ति को ज्ञान, विवेक, आर्थिक समृद्धि और सामाजिक प्रतिष्ठा प्राप्त होती है।
Q: गुरु प्रदोष व्रत से किस प्रकार के कष्टों का निवारण होता है?
यह व्रत जीवन के सभी कष्टों, बाधाओं और शत्रुओं से मुक्ति दिलाता है। भगवान शिव की कृपा से शारीरिक, मानसिक और आर्थिक परेशानियां दूर होती हैं।
Q: ज्योतिष शास्त्र में बृहस्पति ग्रह का क्या महत्व है?
ज्योतिष शास्त्र में, बृहस्पति ग्रह को ज्ञान, बुद्धि, धर्म, संतान, विवाह और सौभाग्य का कारक माना जाता है।
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