पार्श्व एकादशी 2026: तिथि, शुभ मुहूर्त और पूजा विधि से पाएं नारायण कृपा
- द्वारा प्रार्थना संपादकीय टीम
- प्रकाशित: September 16, 2026
- अंतिम अपडेट: September 16, 2026
- 8 Mins

सनातन धर्म में एकादशी का व्रत भगवान विष्णु को समर्पित सबसे पवित्र और महत्वपूर्ण व्रतों में से एक माना जाता है। हर माह में दो एकादशियां आती हैं, जिनमें से प्रत्येक का अपना विशेष महत्व है। इन्हीं में से एक है पार्श्व एकादशी, जिसे परिवर्तिनी एकादशी या वामन एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। यह एकादशी भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को आती है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु अपनी निद्रा के दौरान करवट बदलते हैं, इसलिए इसे 'पार्श्व' एकादशी कहा जाता है। यह व्रत भगवान नारायण की असीम कृपा प्राप्त करने, पापों से मुक्ति पाने और मोक्ष की प्राप्ति के लिए अत्यंत फलदायी माना जाता है।
आइए, हम पार्श्व एकादशी 2026 के महत्व, इसकी पौराणिक कथा, व्रत के लाभ और इसे मनाने की विस्तृत पूजा विधि को जानें ताकि आप भी नारायण की विशेष कृपा प्राप्त कर सकें।
पार्श्व एकादशी 2026: तिथि और शुभ मुहूर्त
हर साल की तरह, वर्ष 2026 में भी पार्श्व एकादशी का व्रत पूर्ण श्रद्धा और भक्ति के साथ रखा जाएगा। पंचांग के अनुसार, वर्ष 2026 में पार्श्व एकादशी निम्नलिखित तिथि और शुभ मुहूर्त पर पड़ेगी:
- एकादशी तिथि प्रारंभ: शनिवार, 19 सितंबर 2026 को रात लगभग 09:30 बजे से
- एकादशी तिथि समाप्त: रविवार, 20 सितंबर 2026 को शाम लगभग 07:15 बजे तक
- पार्श्व एकादशी का व्रत (उदय तिथि अनुसार): रविवार, 20 सितंबर 2026
- पारण का समय (द्वादशी पर व्रत खोलने का समय): सोमवार, 21 सितंबर 2026 को सुबह 06:15 बजे से सुबह 08:30 बजे तक (यह समय स्थानीय सूर्योदय और द्वादशी समाप्ति के अनुसार थोड़ा भिन्न हो सकता है)
(ध्यान दें: उपरोक्त समय भारतीय मानक समय (IST) के अनुसार हैं और स्थानीय पंचांग एवं स्थान के अनुसार इनमें थोड़ा अंतर हो सकता है। व्रत रखने से पहले अपने स्थानीय पंडित या पंचांग से पुष्टि अवश्य कर लें।)
पार्श्व एकादशी का महत्व (एकादशी महत्व)
पार्श्व एकादशी का महत्व स्कंद पुराण और ब्रह्मवैवर्त पुराण सहित कई धार्मिक ग्रंथों में विस्तार से वर्णित है। इस एकादशी का व्रत रखने से व्यक्ति को अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य फल प्राप्त होता है। इसके कुछ प्रमुख महत्व बिंदु इस प्रकार हैं:
- करवट बदलना: यह वह एकादशी है जब भगवान विष्णु क्षीरसागर में अपनी शयन अवस्था में करवट बदलते हैं। इसलिए इस दिन उनकी पूजा का विशेष महत्व है।
- चतुर्मास का प्रभाव: यह एकादशी चतुर्मास के मध्य में आती है, जब भगवान विष्णु योग निद्रा में होते हैं। इस दौरान किए गए सभी शुभ कार्य और व्रत अत्यधिक फलदायी होते हैं।
- पापों का नाश: मान्यता है कि इस व्रत के प्रभाव से व्यक्ति के सभी जाने-अनजाने पाप नष्ट हो जाते हैं और उसे पुण्य की प्राप्ति होती है।
- मोक्ष की प्राप्ति: जो भक्त श्रद्धापूर्वक यह व्रत करते हैं, उन्हें मृत्यु के उपरांत भगवान विष्णु के लोक (वैकुंठ) में स्थान प्राप्त होता है।
- इच्छा पूर्ति: यह एकादशी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए भी जानी जाती है। संतान प्राप्ति, धन-धान्य और सुख-समृद्धि की इच्छा रखने वाले भक्तों को इस व्रत का पालन करने से लाभ होता है।
- वामन अवतार का पूजन: इस दिन भगवान विष्णु के वामन अवतार का पूजन विशेष रूप से किया जाता है, क्योंकि पौराणिक कथा वामन अवतार से संबंधित है।
इस प्रकार, पार्श्व एकादशी का व्रत आध्यात्मिक उन्नति और भौतिक सुखों की प्राप्ति दोनों के लिए अत्यंत शुभकारी माना जाता है।
पौराणिक कथा: वामन अवतार और राजा बलि
पार्श्व एकादशी की कथा भगवान विष्णु के वामन अवतार और भक्त प्रहलाद के पौत्र, परम दानी राजा बलि से जुड़ी है। यह कथा दान, त्याग और भगवान की महिमा का प्रतीक है।
प्राचीन काल में राजा बलि बहुत पराक्रमी और दानी थे। उन्होंने अपने तप और बल से तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया था। इंद्रदेव सहित सभी देवता उनके बढ़ते हुए प्रभाव से चिंतित थे और अपना राज्य वापस पाने के लिए भगवान विष्णु की शरण में गए। भगवान विष्णु ने देवताओं को आश्वासन दिया कि वे जल्द ही सहायता करेंगे।
राजा बलि उस समय नर्मदा नदी के तट पर 'विश्वजीत यज्ञ' कर रहे थे। भगवान विष्णु ने एक छोटे से ब्राह्मण बालक का रूप धारण किया और वहां प्रकट हुए। उनका यह रूप 'वामन' कहलाया। वामन देव ने राजा बलि से भिक्षा में केवल तीन पग भूमि मांगी। राजा बलि, जो अपनी दानवीरता के लिए प्रसिद्ध थे, ने वामन देव की छोटी सी मांग को सहर्ष स्वीकार कर लिया। उनके गुरु शुक्राचार्य ने बलि को समझाया कि यह कोई साधारण बालक नहीं, बल्कि स्वयं भगवान विष्णु हैं, और वे उन्हें छल रहे हैं। लेकिन राजा बलि ने अपने वचन से न हटने का दृढ़ निश्चय किया।
जैसे ही राजा बलि ने तीन पग भूमि दान करने का संकल्प लिया, वामन देव ने विराट रूप धारण कर लिया। उन्होंने अपने पहले पग में पृथ्वी लोक और पाताल लोक को नाप लिया। दूसरे पग में स्वर्ग लोक सहित समस्त ब्रह्मांड को नाप लिया। अब तीसरे पग के लिए कोई स्थान नहीं बचा। राजा बलि ने अपना वचन निभाने के लिए वामन देव से कहा, "हे प्रभु! अब तीसरा पग रखने के लिए मेरे पास कुछ भी नहीं बचा, कृपया आप तीसरा पग मेरे सिर पर रख दें।"
भगवान वामन ने तीसरा पग राजा बलि के सिर पर रखा, जिससे बलि पाताल लोक में चले गए। भगवान वामन राजा बलि की इस दानवीरता और भक्ति से अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने राजा बलि को वरदान दिया कि वे स्वयं पाताल लोक में उनके द्वारपाल बनकर रहेंगे। यही कारण है कि भगवान विष्णु चतुर्मास में पाताल लोक में राजा बलि के यहां निवास करते हैं और परिवर्तिनी एकादशी के दिन करवट बदलते हैं।
यह कथा हमें सिखाती है कि भगवान को सच्ची निष्ठा और समर्पण ही प्रिय है। राजा बलि की दानवीरता और वचनबद्धता आज भी प्रेरणा देती है।
पार्श्व एकादशी व्रत के लाभ (एकादशी व्रत)
पार्श्व एकादशी का व्रत केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मिक शुद्धि और भगवान के प्रति गहरी निष्ठा का मार्ग है। इस व्रत के पालन से भक्तों को अनेक प्रकार के लाभ प्राप्त होते हैं:
- आध्यात्मिक उन्नति: यह व्रत मन को शांत और आत्मा को शुद्ध करता है, जिससे व्यक्ति आध्यात्मिक मार्ग पर आगे बढ़ता है।
- पाप मुक्ति: मान्यता है कि श्रद्धापूर्वक इस व्रत का पालन करने से व्यक्ति जन्म-जन्मांतर के पापों से मुक्त हो जाता है।
- धन और समृद्धि: भगवान विष्णु जगत के पालनहार हैं। उनकी कृपा से व्रती को धन, ऐश्वर्य और भौतिक सुखों की प्राप्ति होती है।
- संतान प्राप्ति: जिन दंपत्तियों को संतान सुख नहीं मिल पा रहा है, वे यदि श्रद्धा से यह व्रत करें तो उन्हें भगवान की कृपा से संतान सुख प्राप्त होता है।
- शत्रु और भय से मुक्ति: यह व्रत शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने और सभी प्रकार के भय से मुक्ति दिलाने में सहायक होता है।
- स्वास्थ्य लाभ: वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी एकादशी का उपवास शरीर को डिटॉक्स करने और पाचन तंत्र को आराम देने में सहायक है, जिससे स्वास्थ्य में सुधार होता है।
- मानसिक शांति: व्रत के दौरान भगवान का स्मरण और ध्यान करने से मन को असीम शांति मिलती है।
- मोक्ष की प्राप्ति: अंततः, यह व्रत व्यक्ति को जीवन-मरण के चक्र से मुक्ति दिलाकर मोक्ष की ओर ले जाता है।
पार्श्व एकादशी पूजा विधि (पूजा विधि)
पार्श्व एकादशी का व्रत पूरे विधि-विधान और सच्ची श्रद्धा के साथ करना चाहिए। भगवान विष्णु की कृपा पाने के लिए नीचे दी गई विस्तृत पूजा विधि का पालन करें:
1. दशमी तिथि पर तैयारी:
- सात्विक भोजन: दशमी तिथि (एकादशी से एक दिन पहले) को शाम के समय सात्विक भोजन करें। इसमें चावल और लहसुन-प्याज का सेवन न करें।
- ब्रह्मचर्य का पालन: दशमी की शाम से लेकर द्वादशी के पारण तक ब्रह्मचर्य का पालन करें।
- स्वच्छता: घर और पूजा स्थल की अच्छी तरह सफाई करें। स्वयं भी स्नान करके शुद्ध हो जाएं।
2. एकादशी के प्रातःकाल (पूजन विधि):
- ब्रह्म मुहूर्त में स्नान: एकादशी के दिन ब्रह्म मुहूर्त (सूर्योदय से पहले) में उठकर किसी पवित्र नदी में या घर पर ही गंगाजल मिले पानी से स्नान करें।
- संकल्प: स्वच्छ वस्त्र धारण कर भगवान विष्णु के समक्ष व्रत का संकल्प लें। हाथ में जल, फूल और अक्षत लेकर कहें, "हे भगवान विष्णु! मैं आज पार्श्व एकादशी का व्रत निष्ठापूर्वक करने का संकल्प लेता/लेती हूं। कृपया मुझे यह व्रत पूर्ण करने की शक्ति प्रदान करें।"
- मूर्ति स्थापना: भगवान विष्णु (या उनके वामन अवतार) की प्रतिमा या तस्वीर को एक स्वच्छ चौकी पर स्थापित करें।
- पंचामृत स्नान: भगवान को पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, गंगाजल) से स्नान कराएं। फिर शुद्ध जल से स्नान करवाकर स्वच्छ वस्त्र अर्पित करें।
- वस्त्र और आभूषण: भगवान को नवीन वस्त्र, उपवस्त्र और आभूषण पहनाएं (यदि संभव हो)।
- तिलक: चंदन, कुमकुम और हल्दी से भगवान को तिलक लगाएं।
- पुष्प और तुलसी दल: भगवान विष्णु को पीले रंग के फूल, ऋतु फल और विशेष रूप से तुलसी दल अर्पित करें। तुलसी दल के बिना भगवान विष्णु की पूजा अधूरी मानी जाती है।
- धूप-दीप: शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करें और धूपबत्ती जलाएं।
- नैवेद्य: भगवान को फल, मिठाई, मिश्री, खीर (बिना चावल के, सिंघाड़े या समा के आटे की) का भोग लगाएं।
- मंत्र जप: 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र का कम से कम 108 बार जाप करें। विष्णु सहस्रनाम का पाठ करना भी अत्यंत शुभ माना जाता है।
- व्रत कथा: पार्श्व एकादशी की पौराणिक कथा का पाठ करें या सुनें।
- आरती: अंत में भगवान विष्णु की आरती करें और सभी को प्रसाद वितरित करें।
3. दिन भर के नियम:
- उपवास: अपनी सामर्थ्य के अनुसार निर्जला (पानी रहित), फलाहारी (केवल फल और जल) या जल ग्रहण कर उपवास करें। अन्न, चावल और दाल का सेवन बिल्कुल न करें।
- भक्ति: दिन भर भगवान विष्णु का स्मरण, भजन और कीर्तन करते रहें।
- नकारात्मकता से बचें: क्रोध, निंदा, चुगली और अन्य नकारात्मक विचारों से दूर रहें।
- रात्रि जागरण: संभव हो तो एकादशी की रात भगवान विष्णु के समक्ष जागरण करें, भजन-कीर्तन करें और उनकी कथाएं सुनें।
4. संध्याकाल की पूजा:
- शाम को पुनः स्नान करके भगवान विष्णु की पूजा करें। दीपक जलाएं, आरती करें और भोग लगाएं।
- दीपक दान: संध्याकाल में तुलसी के पौधे के पास या मंदिर में दीपक अवश्य दान करें।
5. द्वादशी के दिन पारण (व्रत खोलने की विधि):
- स्नान और पूजा: द्वादशी के दिन प्रातः काल उठकर स्नान करें और पुनः भगवान विष्णु की पूजा करें।
- ब्राह्मणों को भोजन: अपनी सामर्थ्य अनुसार ब्राह्मणों को भोजन कराएं या किसी गरीब व्यक्ति को दान दें।
- पारण मुहूर्त में व्रत खोलें: दिए गए पारण मुहूर्त के भीतर व्रत खोलें। चावल या जौ के दाने खाकर व्रत का पारण करना शुभ माना जाता है।
- सात्विक भोजन: व्रत खोलने के बाद सात्विक भोजन ही ग्रहण करें।
नारायण कृपा पाने के विशेष उपाय (नारायण कृपा)
भगवान विष्णु की नारायण कृपा प्राप्त करना जीवन का सबसे बड़ा सौभाग्य है। पार्श्व एकादशी के दिन कुछ विशेष उपायों का पालन करके आप उनकी असीम कृपा पा सकते हैं:
- तुलसी दल का महत्व: भगवान विष्णु को तुलसी दल अत्यंत प्रिय है। एकादशी के दिन विधिवत पूजा के साथ भगवान को तुलसी दल अवश्य अर्पित करें। इससे वे शीघ्र प्रसन्न होते हैं।
- विष्णु सहस्रनाम का पाठ: इस दिन विष्णु सहस्रनाम का पाठ करने से भगवान विष्णु के हजार नामों का जाप होता है, जो अनंत पुण्य फल प्रदान करता है।
- पीले वस्त्र धारण करें: भगवान विष्णु को पीला रंग प्रिय है। एकादशी के दिन पीले रंग के वस्त्र धारण करें और उन्हें पीले फूल अर्पित करें।
- दान-पुण्य: अपनी सामर्थ्य अनुसार गरीबों और जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र या धन का दान करें। गौ-सेवा करना भी अत्यधिक पुण्यकारी माना जाता है।
- वामन अवतार का स्मरण: इस दिन विशेष रूप से भगवान विष्णु के वामन अवतार का स्मरण करें और उनकी कथा सुनें। इससे सभी बाधाएं दूर होती हैं।
- अखंड दीपक: यदि संभव हो तो एकादशी की रात भगवान विष्णु के समक्ष अखंड दीपक जलाएं, जो अगले दिन तक जलता रहे।
- सत्य और अहिंसा: व्रत के दौरान मन, वचन और कर्म से शुद्धता बनाए रखें। सत्य का पालन करें और किसी भी जीव को कष्ट न पहुंचाएं।
- माता-पिता और गुरुजनों का सम्मान: भगवान विष्णु की कृपा पाने के लिए अपने माता-पिता और गुरुजनों का सम्मान करें और उनका आशीर्वाद लें।
निष्कर्ष
पार्श्व एकादशी 2026 का यह पवित्र दिन भगवान विष्णु की भक्ति में लीन होने और उनकी असीम कृपा प्राप्त करने का एक अद्भुत अवसर है। इस दिन सच्चे मन और पूरी श्रद्धा के साथ व्रत रखने और पूजा-पाठ करने से व्यक्ति को न केवल सांसारिक सुखों की प्राप्ति होती है, बल्कि उसे आध्यात्मिक शांति और मोक्ष का मार्ग भी प्रशस्त होता है।
हमें आशा है कि इस विस्तृत गाइड ने आपको पार्श्व एकादशी के महत्व, इसकी कथा, लाभ और पूजा विधि को समझने में मदद की होगी। भगवान नारायण की कृपा आप पर सदैव बनी रहे।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
Q: पार्श्व एकादशी क्या है?
पार्श्व एकादशी भगवान विष्णु को समर्पित एक महत्वपूर्ण व्रत है, जिसे परिवर्तिनी एकादशी या वामन एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। यह भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को आती है।
Q: वर्ष 2026 में पार्श्व एकादशी कब है?
वर्ष 2026 में पार्श्व एकादशी का व्रत (उदय तिथि अनुसार) रविवार, 20 सितंबर 2026 को रखा जाएगा।
Q: पार्श्व एकादशी को 'पार्श्व' एकादशी क्यों कहा जाता है?
ऐसी मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु अपनी निद्रा के दौरान करवट बदलते हैं, इसलिए इसे 'पार्श्व' एकादशी कहा जाता है।
Q: वर्ष 2026 में एकादशी तिथि कब प्रारंभ और समाप्त होगी?
एकादशी तिथि 19 सितंबर 2026 को रात लगभग 09:30 बजे से प्रारंभ होकर 20 सितंबर 2026 को शाम लगभग 07:15 बजे तक समाप्त होगी।
Q: पार्श्व एकादशी 2026 व्रत पारण का समय क्या है?
पार्श्व एकादशी का पारण सोमवार, 21 सितंबर 2026 को सुबह 06:15 बजे से सुबह 08:30 बजे तक किया जा सकता है।
Q: पार्श्व एकादशी का मुख्य महत्व क्या है?
इस एकादशी पर भगवान विष्णु क्षीरसागर में अपनी शयन अवस्था में करवट बदलते हैं। यह चतुर्मास के मध्य में आती है और इसका व्रत रखने से अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य फल प्राप्त होता है।
Q: पार्श्व एकादशी का व्रत रखने से क्या लाभ मिलते हैं?
इस व्रत से व्यक्ति के सभी पाप नष्ट होते हैं, पुण्य की प्राप्ति होती है, मोक्ष मिलता है और मनोकामनाएं (जैसे संतान प्राप्ति, धन-धान्य) पूरी होती हैं।
Q: पार्श्व एकादशी पर भगवान विष्णु के किस अवतार का विशेष पूजन किया जाता है?
इस दिन भगवान विष्णु के वामन अवतार का पूजन विशेष रूप से किया जाता है।
Q: पार्श्व एकादशी के अन्य नाम क्या हैं?
पार्श्व एकादशी को परिवर्तिनी एकादशी या वामन एकादशी के नाम से भी जाना जाता है।
Q: पार्श्व एकादशी का महत्व किन धार्मिक ग्रंथों में वर्णित है?
पार्श्व एकादशी का महत्व स्कंद पुराण और ब्रह्मवैवर्त पुराण सहित कई धार्मिक ग्रंथों में विस्तार से वर्णित है।
प्रार्थना संपादकीय टीम
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